Student Media Body of IIT Kgp

 

Yaadein

Aishwarya Hakande

SN/IG Hall


Computer Science and Engineering




Read More

Aman Kharb

RP Hall


Computer Science and Engineering




Read More

Aman Verma

LLR Hall


Humanities and Social Sciences




Read More

Amarjeet Mehto

MS Hall


Mechanical Engineering




Read More

Amit Jain

RK Hall


Civil Engineering




Read More

Amrut Rajkarne

RP Hall


Electronics and Electrical
Communication Engineering




Read More

Ankit Bansal

LLR Hall


Electronics and
Communication Engineering




Read More

Anubhav Goyal

RP Hall


Industrial Engineering and Management




Read More

Atal Ashutosh Agarwal

RK Hall


Mining Engineering




Read More

Bhupender Singh

LBS Hall


Civil Engineering




Read More

Bhupendra Bule

RK Hall


Industrial and System Engineering




Read More

Deepak Vasman

RK Hall


Humanities and Social Sciences




Read More

Dhruv Jain

RP Hall


Computer Science and Engineering




Read More

Drishti Hora

SN/IG Hall





Read More

Gautam Prasad

RP Hall





Read More

Gyandeep Kumar

Patel Hall


Mining Engineering




Read More

Harsh Gupta

Azad Hall


Mathematics and Computing




Read More

Karthikeyan Kuppu

LLR Hall


Architecture & Regional Planning




Read More

Kartikeya Fatwani

MS Hall


Biotechnology




Read More

Keshav Agarwal

RP Hall


Mathematics and Computing




Read More

Kunal Deosarkar

Azad Hall


Physics




Read More

Kunal Kulbhushan Jain

LLR Hall


Industrial and System Engineering




Read More

M. Siddharth

RK Hall


Electronics & Communication Engineering




Read More

Manoj Meena

Patel Hall


Electrical Engineering




Read More

Neha Aggarwal

SN/IG Hall


Electrical Engineering




Read More

Nikhil Garg

LLR Hall





Read More

Nishant Kumar

Azad Hall


Metallurgical and Materials science Engineering




Read More

P. Onishant

RK Hall


Exploration Geophysics




Read More

Poonam Gupta

MT Hall


Agriculture and Food Engineering




Read More

Praniti Agrawal

MT Hall


Economics




Read More

Prasad Fadke

LLR Hall


Aerospace Engineering




Read More

Pratibha Verma

MT Hall


Architecture and Regional Planning




Read More

Pratik Khedikar

Patel Hall


Instrumentation Engineering




Read More

Pratiksha Patil

MT Hall


Industrial and System Engineering




Read More

Priyanka Jayaswal

MT Hall


Mathematics and Computing




Read More

Ramesh Thakur

Azad Hall


Chemical Engineering




Read More

Rameshwar Jaiswal

RP Hall


Mechanical Engineering




Read More

Ravi Ranjan

RK Hall


Mining Engineering




Read More

Richa Bhushan

SN/IG Hall


Chemical Engineering




Read More

Riya Bubna

SN/IG Hall


Computer Science and Engineering




Read More

Ruchita Kachhap

SN/IG Hall


Electrical Engineering




Read More

Sandeep Siram

Azad Hall


Mechanical Engineering




Read More

Sanjay Yadav

MS Hall


Chemical Engineering




Read More

Sarthak Jain

RK Hall


Civil Engineering




Read More

Sarthak Badjatya

Azad Hall


Humanities and Social Sciences




Read More

Shaique Mustafa

RP Hall


Physics




Read More

Shambhobhi Bhattacharya

SN/IG Hall


Mechanical Engineering




Read More

Shraddesh Chandra

Azad Hall


Civil Engineering




Read More

Shravya Pawar

MT Hall


Electrical Engineering




Read More

Shruti Sarode

SN/IG Hall


Biotechnology and Biochemical Engineering




Read More

Shubham Kedia

Azad Hall


Chemical Engineering




Read More

Shubham Sharma

Nehru Hall


Computer Science and Engineering




Read More

Shyam Simaria

Azad Hall


Industrial and Management




Read More

Siddarth Gurbani

RK Hall


Electronics & Electrical Communication Engineering




Read More

Sidhartha Satapathy

LLR Hall


Computer Science and Engineering




Read More

Sneh Pratik

Nehru Hall


Physics




Read More

Srinivas Jarupula

RP Hall


Humanities and Social Sciences




Read More

Surya Chakrabarti

RK Hall


Mechanical Engineering




Read More

Tanmay Jha

Azad Hall


Chemical Engineering




Read More

Vamshi Priya

MT Hall


Chemical Engineering




Read More

Vipasha Jain

SN/IG Hall


Humanities and Social Sciences




Read More

Vishakha Sinha

SN/IG Hall


Industrial and Systems Engineering




Read More

Vishal Singh

Azad Hall


Electrical Engineering




Read More

Vishnu Sharma

RP Hall


Electronics and Electrical Communication Engineering




Read More

Aishwarya Hakande

|| Computer Science and Engineering ||

|| SN/IG Hall ||

यहाँ बिताया हुआ एक-एक साल अपने आप में अलग रहा है। बिताए हुए समय का वर्णन मैं शायद कभी न कर पाऊँ। यहाँ आने से पहले मैं बहुत अलग इंसान थी। हालाँकि मैं स्पोर्ट्स में शामिल थी, मेरा ध्यान पढ़ने में ही ज़्यादा रहता था। यहाँ आ कर मेरा सामाजिक दायरा तेज़ी से बढ़ा। मैं पहले साल के दौरान काफ़ी सारी सोसाईटीज़ का हिस्सा थी - टीम कार्ट, डेब्सॉक, ETDS आदि। मैं केजीपी में हर जगह देखना चाहती थी, पूरा कैंपस एक्सप्लोर करना चाहती थी। ये इच्छा मैंने पहले साल के दौरान ही पूरी कर ली थी। पहले साल के इंटर आईआईटी के अनुभव के बाद मुझे यह एहसास हुआ कि मुझे अभ्यास की सख़्त ज़रूरत है। अपने दूसरे वर्ष के दौरान मैंने तैराकी पर ध्यान दिया। मेरी हमेशा से यह ख़्वाहिश थी कि मेरे पास पदक हो और यह स्वप्न तीसरे वर्ष तक पूरा हो चुका था। अपने तीसरे साल के दौरान ही मैंने अपनी पढ़ाई पर भी काफ़ी ध्यान दिया। मैं अनुसंधान में रूचि रखती हूँ। इसलिए मैंने क्वांटम क्रिप्टोग्राफी के क्षेत्र में इंटर्नशिप की जो मेरे विभाग से किसी ख़ास रूप से सम्बंधित नहीं है। मेरी G.Sec. स्पोर्ट्स बनने की इच्छा थी, पर स्पोर्ट्स नॉमिनी के पद के लिए मेरा चुनाव कर लिया गया था। अपने स्पोर्ट्स नॉमिनी के कार्यकाल के दौरान लड़कियों की खेल में भागीदारी बढ़ाने का मैंने पूरा प्रयास किया और अभी भी मैंने वह जारी रखा है। इस जगह को छोड़ना मेरे लिए एक तरीके से बहुत ही दुःखद है। इन चार सालों में बहुत कुछ सीखा है। पहले साल से लेकर आज तक हर बार मैं एक अलग इंसान बनकर उभरी हूँ। मैं खुद में साल-दर-साल आये परिवर्तन को देख पा रही हूँ। केजीपी जैसी ज़िंदगी कहीं और नहीं मिलेगी। मैं बस इतना ही कहना चाहूँगी कि कुछ बंधन ज़रूरी होते हैं, पर कभी खुद को रोकना नहीं चाहिए। सब कुछ कम से कम एक बार अनुभव जरूर करना चाहिए। हमें कहीं न कहीं हमेशा याद रखना होगा कि हम एक प्रौद्योगिकी संस्थान का हिस्सा हैं। यहाँ वह सबसे महत्वपूर्ण है। खेल और सांस्कृतिक गतिविधियाँ भी जीवन में महत्वपूर्ण हैं परंतु वह यहाँ आने का प्रथम उद्देश्य नही है। हमें विज्ञान और तकनीक में श्रेष्ठता हासिल करने के लक्ष्य की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।

Aman Kharb

|| Computer Science and Engineering ||

|| RP Hall ||

केजीपी में बिताए इन 4 वर्षों में मैंने ढेर सारी यादें बटोरी हैं, जो कि स्विमिंग, नाईट आउट्स और ढेर सारी मस्ती व खेल कूद से भरी पड़ी है| मुझे शुरुआत से ही स्विमिंग का शौक था और यहाँ आकर तो मुझ पर स्विमिंग का जुनून ही सवार हो गया| कभी-कभी मुझे CG को लेकर थोड़ा डर रहता था कि बाद में मुझ पर लोड न बढ़ जाए, लेकिन धीरे-धीरे समय-प्रबंधन के साथ में मैं यह भी सीख गया कि खेलना-कूदना, दोस्तों के साथ की हुई मस्ती हमारे दिल में वो यादें बन जाती हैं जो ताउम्र हमारे साथ रहती है| CS का तीसरा सेमेस्टर सबसे मुश्किल माना जाता है और मैं तो तब भी 6-6 घंटे स्विमिंग करता था और क्लासेज़ जाता था| मेरी रूचि कुछ समय बाद इतनी बढ़ गयी कि मेरे लिए ये केवल CV बनाने की बात नहीं रह गयी थी| इसके अलावा मैंने इंटर-हॉल क्रिकेट भी खेला| स्विमिंग में मैं 4 वर्ष इंटर-आईआईटी गया और इस वर्ष तो कप्तान भी था| पिछले वर्ष 17 साल बाद हमारा वाटर पोलो में स्वर्ण पदक आया था और उस क्रम को जारी रखते इस बार भी हम वाटर पोलो में स्वर्ण पदक लाने में सफल रहे| यहाँ तक कि हम चार दोस्तों ने तो इसके लिए प्लेसमेंट के समय भी पूरे एक सेमेस्टर काफ़ी लगन से स्विमिंग की क्योंकि हमारे अंदर एक और स्वर्ण लाने की भूख थी| अंत में जैसे-तैसे हमने अपना प्लेसमेंट भी संभाला, वो समय मुझे अच्छे स्तर का प्रबंधन कौशल सीखा कर गया और बहुत सी यादे जोड़ गया| इसके अलावा मेरा इंटर-आईआईटी का ये अनुभव मैं कभी नहीं भूलूंगा कि किस तरह हमने आईआईटी मद्रास और आईआईटी कानपुर के कैम्पस में उन्हीं को हराया था और वो दर्शक जिनसे प्रतियोगिता की दर्शक-दीर्घा खचाखच भारी हुई थी| यहाँ आकर मैंने जाना कि अगर किसी एक्टिविटी या कार्य को लेकर तुम्हारे मन में जुनून है तो तुम किसी भी परिस्थिति में उसे कर पाने के लिए समय निकाल ही लेते हो| यहाँ बिताए वर्षों में आपको ऐसे दोस्त मिलेंगे जो हर पल आपका साथ देते हैं और लोड चाहे कितना ही हो, अंत में सब ठीक हो जाता है| ये संस्थान एक गाँव की तरह है जहाँ हम सभी अपने दोस्तों के साथ खुल कर मस्ती कर सकते हैं| मुझे लगता है जैसा आनंद मैंने जीवन का इस खूबसूरत और शांत जगह पर लिया है वो मैं किसी अन्य स्थान पर कभी नही ले पाऊँगा|

Aman Verma

|| Humanities and Social Sciences ||

|| LLR Hall ||

केजीपी ने मुझे पूरी तरह से एक बदले व्यक्तित्व में परिणत कर दिया है। मेरी परिपक़्वता के विकास का श्रेय मैं केजीपी की संस्कृति को ही देता हूँ। केजीपी का मानविकी तथा सामाजिक विज्ञान (HSS) विभाग मेरे लिए एक आसान निर्णय था। मैं अपने प्रथम वर्ष में MMM हॉल में था। वहाँ मुझे ज्यादा सीनियर्स से मिलने का अवसर नहीं मिल पाया। उस साल मैं गेम थ्योरी सोसाइटी में शामिल हुआ था परंतु स्प्रिंग सेमेस्टर में मैं उससे अलग हो गया। मैंने यहाँ पहली बार स्कवॉश एवं हॉकी खेला। कक्षाओं में वैसे भी कम ही दिलचस्पी थी। मौज-मस्ती में ही मेरा एक साल गुज़र गया | द्वितीय वर्ष में मैं LLR हॉल आया जहाँ मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। OP का अनुभव मेरे लिए काफी फलदायक रहा। मैं OP के कारण ही पहली बार नाटक और कोरिओ में शामिल हो पाया। यहाँ सीनियर्स से बातचीत के बाद मुझे पता चला कि मैं यहाँ क्या-क्या कर सकता हूँ। उस समय मैं हॉल के वेटलिफ्टिंग और स्कवॉश का सचिव भी बना। और मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती इन खेलों के लिए कुशल प्रतिभागियों को लाना था। उस वर्ष हमारे हॉल से वेटलिफ्टिंग की टीम ने तीन वर्ष बाद प्रतिस्पर्धा में भाग ली और स्कवॉश में हमने स्वर्ण पदक भी जीता। शायद इन्हीं सब की वजह से मुझे सर्वश्रेष्ठ सचिव का पुरस्कार मिला। तृतीय वर्ष के दिसंबर माह में मैंने अपने स्वेच्छापूर्वक MHRD की कौशल विकास (स्किल डेवलपमेंट) के ऊपर एक प्रोजैक्ट ले लिया। अंत में अपने रिपोर्ट में मैंने काफ़ी सारी सिफ़ारिशें की। जब 2015 में भारत सरकार की कौशल विकास नीति आयी, उसमें हमारे दो सिफारिशों को कार्यान्वित किया गया। यह देख कर मुझे बहुत ख़ुशी हुई थी। सीनियर्स के प्रेरित करने की वजह से ही मैं अपने तृतीय वर्ष में इंटर हॉल इंग्लिश और हिंदी ड्रामेटिक्स में शामिल हुआ। अपने चौथे वर्ष में मुझे अपने LLR हॉल का हॉल प्रेसिडेंट बनने का भी सुनहरा अवसर मिला। यह अनुभव मेरे लिए पूरी तरह से अलग था। मुझे अपने ऊपर बहुत बड़ी जिम्मेदारी का एहसास हुआ। हॉल प्रेसिडेंट ही हॉल की किसी भी घटना के लिए जवाबदेह और जिम्मेदार होता है। हॉल की स्थिति GC और जिमखाना चुनावों में पिछले कुछ वर्षों से अच्छी नहीं थी। टेक GC में उस साल अच्छी शुरुआत हुई थी। अगले सेमेस्टर में लगा कि जिमखाना में हॉल का कोई प्रतिनिधित्व तो ज़रूर होना चाहिए। तमाम चीज़ो को देखने के बाद और परिस्थितियों को समझकर लगा की इस साल उपाध्यक्ष (VP) पद के लिए कोशिश की जा सकती है। हॉल के सभी छात्रों ने बहुत कड़ी मेहनत की और फिर वह हुआ जिसपर किसी को यकीन नहीं था। बारह वर्षों के लम्बे अंतराल के बाद हमारे हॉल से VP बना। वह चुनाव एक विचारधारा का चुनाव था जिसका मूल्य यह था कि संस्थान में कोई भी फेस्ट, सोसाइटी और हॉल सर्वोच्च नहीं हैं। सब एक दूसरे के साथ मिलकर समन्वय से संस्थान के लिए काम करते हैं। मेरे लिए कोई भी पद छोटा या बड़ा नहीं था क्योंकि मैं हर ज़िम्मेदारी से कुछ नया अनुभव करता था। जब मैं सचिव या हॉल अध्यक्ष था, मैंने अपना पूरा प्रयास चीज़ों को और बेहतर बनाने के लिए किया। परिणाम मेरे लिए बाद में मायने रखता था। अपने चौथे वर्ष का अनिवार्य इंटर्नशिप मैंने हॉल के ही एक एलम के दिल्ली बेस्ड स्टार्टअप में किया - Zapdel । दो महीने की इंटर्नशिप से मुझे PPO भी मिल गया था। अब मैंने दिल्ली जा कर UPSC के लिए तैयारी करने का निर्णय लिया है। मुझे दोस्तों और सीनियर्स से बात करने में बहुत अच्छा लगता था। मुझे उनके अनुभव सुनने में काफी रूचि थी जिससे मुझे काफी कुछ सीखने को मिला। विभिन्न गतिविधियां, कई लोगों से मिले अनुभव और हॉल से मिले अवसरों ने मुझे गढ़ा है। मेरे केजीपी जीवन के हर उतार चढ़ाव में मेरे साथ “सल्तनत्” - मेरे विंग मेटस थे। इन सब के लिए खुद को मैं सौभाग्यशाली मानता हूँ। संस्थान में मेरा सबसे यादगार पल वह था जब VP चुनाव जीतने के बाद जिमखाना के सामने पूरे हॉल ने साथ में टेम्पो शाउट किया था। संस्थान में मेरा बहुत अच्छा अनुभव रहा। यहाँ हर व्यक्ति को हर तरह का अवसर मिलता है। यहाँ आप किसी भी क्षेत्र में उत्कृष्ट हो सकते हैं। जूनियर्स के लिए यही सन्देश है कि अपने रूम से निकलो, अपने दोस्तों और सीनियर से बातचीत करो। हॉल सोसाइटी, फेस्ट और जिमखाना में बहुत सारे अच्छे अवसर हैं, उन्हें व्यर्थ मत जाने दो। “जीवन में कुछ खूबसूरत चीजें खोए बिना हासिल नहीं की जा सकतीं”।

Amarjeet Mehto

|| Mechanical Engineering ||

|| MS Hall ||

केजीपी ने मुझे अनगिनत यादें और बहुत सारे अनुभव दिए हैं| मैं जब पहली बार केजीपी में आया तो मुझे MMM छात्रावास मिला| शुरुआत में किसी और शहर के लोगों से बात करने में थोड़ी हिचकिचाहट तो हुई, पर धीरे-धीरे मुझे पता चला कि केजीपी में तो एक छोटा-सा भारत बसता है| यह एक बहुत बड़ी खासियत है केजीपी की, जिससे आपको काफ़ी कुछ सीखने को मिल सकता है| सैकेंड ईयर में मैं MS छात्रावास पहुँचा और सीनियर्स की मदद से मुझे एथलेटिक्स में आने का मौका मिला| मैंने जीसी की प्रतियोगिता में रजत(सिल्वर) पदक हासिल किया| उसके बाद मेरे दोस्तों व कोच की प्रेरणा से मैंने इंटर आईआईटी में भी भाग लिया| सैकेंड ईयर में मैं अपने हॉल की गतिविधियों में भी काफ़ी भाग लेता रहा और मैं HCM भी था| इस दौरान अलग-अलग काम करते हुए मैंने काफ़ी अच्छे दोस्त भी बनाए| फोर्थ ईयर में मैंने अपने हॉल में मैस की समस्याओं को दूर करने का ज़िम्मा हाथ में लिया और हम सफलतापूर्वक परिवर्तन ला सके| हालाँकि मैं अपने ऐकेडमिक्स को लेकर पर्याप्त गंभीर नहीं था, लेकिन समय के साथ मुझे इसका महत्व समझ आ गया और मैं मेरे मित्रों की मदद से उसे सुधार पाने में कामयाब हुआ| अतः केजीपी की जनता से यही कहूँगा कि को दूसरी प्राथमिकता कभी ना दे लेकिन अन्य चीज़ें भी करना जारी रखें| केजीपी में मैंने दीघा बीच की ट्रिप के दौरान मैंने अपने दो दोस्तों को भी खोया जिनके बारे में याद आते ही आँखे नाम हो जाती हैं| जूनियर्स से एक बात और कहूँगा कि यहाँ बहुत सारे दोस्त बनाइए और किसी न किसी गतिविधि में शामिल रहिये| आजकल छात्रों का जीवन एकांत और अवसादग्रस्त होता जा रहा है| हमें चाहिए कि न केवल हमारा संस्थान व सोसाइटीज़ इसके लिए आगे बढ़कर ज़रूरी कदम उठाए बल्कि हम भी वर्चुअल दुनिया के बजाए अपने दोस्तों के साथ ज़्यादा समय व्यतीत करें|

Amit Jain

|| Civil Engineering ||

|| RK Hall ||

केजीपी का यह सफर अब ख़त्म होने को आ गया है, देखते ही देखते ये पाँच साल गुज़र गए। मैं यहाँ शुरुआत में थोड़ा डरा-डरा रहता था, सब कुछ मेरे लिए नया था और सीनियर्स को भी उतने अच्छे से नहीं जानता था। जैसे-जैसे समय गुज़रा मैं अलग-अलग गतिविधियों में भाग लेने लगा, लोगों को जानने लगा। यहाँ के हर पहलू ने मेरा आत्मविश्वास बढ़ाने में योगदान दिया है, जिसमें सबसे बड़ा योगदान Megalith और हॉकी का रहा है । द्वितीय वर्ष में एक गहरी चोट के कारण मेरा हॉकी खेलना तो छूट गया पर टीम के साथ मेरा जुड़ाव कम नहीं हुआ। मैं अपने खाली समय में प्रैक्टिस के लिए चला जाया करता था। मेरे साथी खिलाड़ी आज भी मेरे अच्छे दोस्त हैं । हमने थर्ड ईयर में Megalith आयोजित कराया था जिससे मेरा काफ़ी लगाव रहा है। इसी के ज़रिए मैंने ज़िम्मेदारियाँ संभालना और दबाव झेलना सीखा। मेरा मानना है कि दबाव मैं व्यक्ति का कौशल और भी निखर कर आता है। मुझे जो सबसे ज्यादा याद आएगा वो है यहाँ की दोस्तों के साथ मस्ती, सीनियर्स और हॉल की OP। इल्लू का समय भी बहुत याद आएगा, इल्लू के समय कभी नये सीनियर्स तो कभी नये जूनियर्स से मुलाकात हुआ करती थी, और सभी एकजुट होकर उसे पूरा करने के लिए मेहनत करते थे। मैं अपने चतुर्थ वर्ष में इल्लू का कप्तान भी रहा हूँ । मेरे लिए प्लेसमेंट के बाद वाला समय काफ़ी यादगार रहेगा। वो रोज सुबह 5-6 बजे उठना, लम्बी ट्रिप पर जाना, इस समय में आपका मन फिर एक फच्चे-सा हो जाता है| जो करना है करिये, कोई भी रूचि उठाइये और उसी में लग जाइये क्योंकि यह समय वापिस लौट के नहीं आने वाला। अपने जूनियर्स के लिए मेरी सलाह यही है कि ये आज़ादी और ऐसे दोस्त फिर नहीं मिलेंगे तो ज़िन्दगी जितनी जीनी है खुल के जियो, बस अपने आप को रूम में सीमित मत रखो।

Amrut Rajkarne

|| Electronics and Electrical
Communication Engineering ||

|| RP Hall ||

केजीपी मेरे लिए एक बहुत ही अमनपसंद जगह रही और यह सोचकर थोड़ा दुःख हो रहा है कि यह सफर समाप्त होने वाला है। मुझे आज भी याद है कि मेरे प्रथम वर्ष के पहले दिन से ही मैं यहाँ की हर चीज़ से कितना सम्मोहित हुआ था व यहाँ के वातावरण में कितना घुल मिल गया था। प्रथम वर्ष हमारे पूरे सफर का सबसे अदभुत समय होता है और यह बहुत ही ज़रूरी है कि हम हमारा समय एवं ऊर्जा सही जगह पर निवेश करें क्यूंकि उस समय हम जो दोस्त बनाते हैं व जिन गतिविधियों का हिस्सा बनते हैं, अक्सर वे ही हमारे आगे का सफर तय करती हैं। मैं बहुत भाग्यशाली था कि मुझे इ-सेल का हिस्सा बनने का मौका मिला। मैंने प्लेसमेन्ट कमिटी के सदस्य का पद भी संभाला और उसमें मुझे प्लेसमेंट संभालने व संस्थान की समृद्ध कार्यप्रणाली में अपना योगदान देने से एक नया अनुभव मिला। केजीपी में मैंने काफी अच्छे दोस्त बनाये हैं जो हमेशा के लिए मेरे जीवन में मेरे साथ रहेंगे। मेरा ऐसा मानना है कि अगर हम केजीपी के वातावरण में खुद को अच्छे से ढ़ाल लेते हैं तो यहाँ का जीवन काफी आनंदमय हो जाता है। यह एक अद्भुत सफर था और मैं अभी भी यह चाहूँगा कि मुझे वो सारे हसीन पल जीने का मौका एक बार और मिले। कितनी बार ही वे सब यादें मेरे दिलो-दिमाग में छा जातीं हैं, जब भी केजीपी मेरे मन में आता है। केजीपी को अलविदा कहना आसान नहीं होगा।

Ankit Bansal

|| Electronics and
Communication Engineering ||

|| LLR Hall ||

आईआईटी की तैयारी के दौरान अक्सर हमें प्रेरणा देने के लिए यह कहा जाता था कि आईआईटी में जाने के बाद ज़िन्दगी स्वतः सही दिशा में चली जाती है। लेकिन असल बात तो यह है कि यहाँ आकर लोगों को समझ आता है कि ज़िन्दगी क्या है, उन्हें जिंदगी में क्या करना है। खड़गपुर की ज़िन्दगी को मैं प्रयोगशाला की तरह मानता हूँ जहाँ आप अलग अलग चीज़ों में हाथ आज़माते हो। मैं आवाज़, SWG और 5-मिनट्स का हिस्सा बना। मुझे पत्रकारिता, वेलफेयर और वीडियो मेकिंग जैसे विभिन्न क्षेत्रों में काम करने का मौका मिला। इन सोसाइटीज की वजह से मैंने पांच वर्षों में अपने व्यक्तित्व का विकास होते हुए देखा। JEE के बाद से मैं संगीत सीखना चाहता था जिसे मैंने अपने हॉल LLR की म्यूजिक टीम का हिस्सा बनकर सीखा और मुझे स्टेज पर प्रदर्शन करने का भी अवसर मिला। मेरे अनुभव में थर्ड ईयर ने मुझे एक जिम्मेदार व्यक्ति बनाने का काम किया। थर्ड ईयर आते ही आपको सोसाइटी की ज़िम्मेदारी मिल जाती है और पढ़ाई का लोड भी काफी बढ़ जाता है। इसके साथ साथ इंटर्नशिप का भी लोड आ जाता है। थर्ड ईयर के दबाव ने मुझे कार्य कुशल बनाया। मैंने अपनी इंटर्नशिप के दौरान अपनी रूचि ढूंढ़ने की कोशिश में भिन्न भिन्न क्षेत्रों में इंटर्न की। मैंने सेकंड ईयर के अंत में हार्डवेयर इंटर्न की ताकि मैं अपने डिपार्टमेंट ECE के काम से परिचित हो पाऊं। थर्ड ईयर में मेरी इंटर्न Sandisk में लगी जहाँ मुझे सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट पर काम करने का मौका मिला। फोर्थ ईयर में मैं रिसर्च के क्षेत्र को एक्स्प्लोर करना चाहता था इसलिए मैंने सिंगापुर के रिसर्च सेंटर A *STAR में इंटर्न की। मैं खुद को बहुत भाग्यशाली मानता हूँ कि मैंने ड्यूल डिग्री कोर्स में एडमिशन लिया। इससे मुझे अपने फोर्थ ईयर में एक स्टार्ट-अप करने का मौका मिला। मैंने अपने दोस्तों के साथ अलाइव होम नाम का स्टार्टअप शुरू किया जिसमें हमने एक होम ऑटोमेशन प्रोडक्ट पर काम किया। हर स्टार्टअप की तरह इस स्टार्टअप ने भी काफी कुछ सिखाया। हम काफी हद तक सफल भी हुए, बहुत सारी प्रतियोगताओं में पुरस्कृत हुए। लेकिन मार्केट की स्थिति को ध्यान में रखते हुए हमें इस विचार को त्यागना पड़ा।जूनियर्स को कहना चाहूँगा कि सोसाइटी से सिर्फ सर्टिफिकेट पाने के लिए नहीं जुड़ना चाहिए बल्कि आपको ये मद्देनज़र रखना चाहिए कि वहाँ आपका विकास हो। अंत में यही बात मायने रखती है कि किसी कला में आप कितने निपुण हैं। इसलिए जूनियर्स को इस निपुणता को हासिल करने की सलाह देना चाहूँगा और अपनी रूचि को खोजने की जी-तोड़ कोशिश करते रहें।

Anubhav Goyal

|| Industrial Engineering and Management ||

|| RP Hall ||

मेरा जब आईआईटी में चयन हुआ और जब मुझे केजीपी मिला तब मुझे केजीपी का पता भी नहीं पता था। जब मई में यहाँ पहली बार आया तब लगा कि यहाँ आकर तो फँस गए अगले पांच साल के लिए। यहाँ आकर जो मेरे साथ सबसे पहली अच्छी चीज़ हुई, वह थी आर.पी. हॉल मिलना। मेरी कक्षाओं में उपस्थिति इसकी वजह से काफी अच्छी थी। प्रथम वर्ष में मैं बहुत सी सोसाइटीज के चयन में गया। व्यक्तिगत रूप से मेरा ऐसा मानना है कि हमें कुछ न कुछ नया सीखने या करने की कोशिश करते रहनी चाहिए। मैं टीम कार्ट का हिस्सा बना और उसमें मैंने काफी कुछ सीखा। मुझे वह काफी रोचक व चुनौतीपूर्ण लगा। हमारे हॉल में भी सीनियर्स काफी टेम्पो से वर्कशॉप्स आयोजित करते थे और फिर अंत में नाश्ता भी देते थे, तो हॉल में उन वर्कशॉप्स में जाने में भी काफी मजा आता था और काफी कुछ सीखने को भी मिलता था। मेरे द्वितीय वर्ष के सेकंड सेम में मैं पहली बार केजीपी के बाहर किसी प्रतियोगिता के लिए गया था और उसके बात तो मेरी केजीपी की ज़िंदगी प्रतियोगिताओं के चक्रवात में ही घूमती रही। चौथे वर्ष में तो मेरा अधिकतर समय हल्ट में ही निकला। हम लोग आईआईएम अहमदाबाद गए थे और वहाँ हमने प्रथम स्थान प्राप्त किया। उसके बाद हमें बोस्टन जाने का मौका मिला। तब हमें एहसास हुआ कि केजीपी को हम जितना समझते हैं, वह उससे कहीं ज्यादा बड़ा है और तब हमें हमारे एलम बेस के विस्तार का अहसास हुआ। हमने जब एलम से संपर्क किया तब उन्होंने हमारे आवास का इंतज़ाम करा दिया। जब उन्होंने अपने साथी केजीपीयंस को हमारे बारे में बताया तो और भी कई एलम हमसे मिले। कोई हमें रेस्टोरेंट ले गए, तो कोई हमें खरीदारी के लिए ले गए, तो किसी ने हमें वाल स्ट्रीट भी बुलाया। जो भी हमसे मिलते थे, वे सभी हमसे सबसे पहले यही पूछते थे कि केजीपी में क्या चल रहा है और केजीपी कैसा है। वे सभी एलम केजीपी से उत्तीर्ण होने के बाद कभी वापस केजीपी आये ही नहीं थे और उनमें इतने समय बाद केजीपी को लेकर इतना टेम्पो देखकर हम आश्चर्यचकित हो गए थे। वे तो हमसे उनके हॉल के बारे में भी पूछ रहे थे और उससे साफ़ प्रतीत हो रहा था कि उनमें अभी भी हॉल टेम्पो उतना ही मौजूद है। उस समय हमें लगा कि शायद हम में इतना टेम्पो न हो केजीपी के प्रति, किन्तु जब हम भी यहाँ से दूर हो जाएंगे तो बीस-तीस वर्ष बाद हम भी ऐसा ही कुछ महसूस करेंगे। वह सफर मुझे सदैव ही याद रहेगा। इस बार टेक मीट में भी काफी मज़ा आया था। कानपुर वालों ने कुछ फर्जी सा टेम्पो शाउट किया था और हमने तो फिर ऐसा टेम्पो शाउट किया था कि सभी अचंभित हो गए थे। हम उन्हें टेम्पो शाउट सिखा कर आये थे। पहले मैं कभी रात में जगता ही नहीं था किन्तु अब बिलकुल उल्टा हो गया हूँ। अगर मुझे कोई पूछे कि केजीपी में सबसे अच्छी चीज़ क्या सीखी, तो मेरा उत्तर होगा 'नाईट आउट मारना'। मेरी भले ही बहुत सी अच्छी यादें हों, किन्तु मेरा सबसे अच्छा समय जो बीता है वह है मेरी विंग में दोस्तों के साथ मस्ती वाला वक्त। हर विंग का एक सरकारी रूम होता है जिसमें सभी इकठ्ठा होकर मजे करते हैं। मेरी विंग में वह रूम मेरा था। मेरा नाम भी गोलू दा पड़ गया है।

Atal Ashutosh Agarwal

|| Mining Engineering ||

|| RK Hall ||

अगर मैं अपनी केजीपी के जीवन की बात करुँ तो मैं यह कहूँगा कि मैंने अपने ये पांच साल उसी तरीके से जिए जिस तरह से मैं जीना चाहता था और मैं पूरी तरह से संतुष्ट हूँ। इन पांच सालों में मेरे जीवन में बहुत परिवर्तन आया और हमेशा ही उत्साह बना रहा है। यहाँ पर फर्स्ट ईयर में आने से पहले अन्ना हज़ारे के आंदोलन को देखकर मेरे अंदर राष्ट्रवाद की भावना जागी थी। जब मैं यहाँ कैंपस आया तो यहाँ पर एक सीनियर थे जो गोल बाज़ार में उपवास पर बैठे थे। मैंने समाचार में उनके बारे में पढ़ा था, इसलिए मैं सबसे पहले उनसे मिलने गया। आने के 2-3 दिन बाद ही मुझे गोल बाज़ार में लोगों ने एक कार्यक्रम में मुझे भाषण देने के लिए भी बुलाया। इससे मेरी एक विशेष याद जुड़ी हुई है कि फ्रेशर्स ओरिएंटेशन प्रोग्राम में करीब 200 - 300 लोग अन्ना हज़ारे के लिए नारे लगा रहे थे। उस समय तक काफ़ी लोग जान चुके थे कि मैं एक क्रांतिकारी किस्म का लड़का हूँ। मैं फर्स्ट ईयर में LBS में जॉइंट सेक्रेटरी (मेस) भी था। तब मुझे यह एहसास हुआ कि तुम सिस्टम की आलोचना तब तक ही कर सकते हो जब तक तुम सिस्टम में कोई पद नहीं रखते। मुझे दिख गया था कि मेस में बदलाव लाना हमारे काबू में नहीं है और एक फर्स्ट ईयर के लिए कुछ कर पाना संभव नहीं था । हमने मेस में काम करने वालों को दो बार ख़राब खाना पकाते हुए पकड़ा। मैं अपने G.Sec. मेस के साथ उनसे उस लापरवाही की वजह पूछने को और मेस सिस्टम सुधारने के लिए उनका सामना करने को तैयार हो गया। उस दिन बहुत हंगामा हुआ और काफी प्रोफेसर भी आ गए, पर उस मामले को शांत कर दिया गया। कुछ दिनों बाद मेरे साथ वाले जॉइंट सेक्रेटरी की एक गलती की वजह से हम दोनों को ससपेंड कर दिया गया। मुझे बहुत बुरा लगा क्योंकि मैं सिस्टम में बदलाव लाने आया था लेकिन मैं खुद ही ससपेंड हो गया। मैंने बाद में जिमखाना में एप्लीकेशन कप के लिए सेक्रेटरी का चुनाव लड़ने की सोची और खूब प्रचार-प्रसार भी किया, लेकिन किसी ने आखिरी दिन पर LBS मेस वाली घटना का हवाला देकर मेरा नामांकन रद्द करवा दिया। मैं फर्स्ट ईयर के अंत में AGV से जुड़ा और मैंने वहाँ काफ़ी काम किया। सेकंड ईयर में RK में आने के बाद मुझे सीनियर्स ने A.Cell का हिस्सा बनने का सुझाव दिया। AGV और A.Cell का काम साथ-साथ करना मेरे लिए मुश्किल हो रहा था और इसलिए मैं AGV को ज़्यादा समय नहीं दे पाया। थर्ड ईयर में मैंने A.Cell में स्पॉन्सरशिप में काम किया और मैं AGV में टीम लीडर भी था। थर्ड ईयर के अंत में मैंने VP चुनाव के लिए नामांकन भर दिया। उस समय मुझे यह डर भी था कि कहीं पिछली बार की तरह मेरा VP का नामांकन भी रद्द न हो जाये। मैंने अच्छे से प्रचार अभियान भी किया। मैं अपनी ताकत यह मानता था कि मैं लोगों के नाम बहुत जल्दी याद कर लेता था और इसलिए लोग मुझसे जुड़े हुए महसूस करते थे। इसी कारण, मैं करीब 2100 वोटों से जीता। मैंने अपने VP के कार्यकाल में हमेशा किसी न किसी नई चीज़ों पर अमल करने का पूरा प्रयास किया। अगर मुझे कुछ गलत होता हुआ लगता था तो मैं उस चीज़ के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए हर स्तर तक पहुँचने को तैयार रहता था चाहे मुझे डायरेक्टर तक ही क्यों न जाना पड़े। इस कारण एडमिनिस्ट्रेशन के कुछ लोग मुझे इतना पसंद नहीं करते थे। मैंने हमेशा यह कोशिश की कि केजीपी में सख्ती और सौम्यता के बीच एक संतुलन बना रहे। मैं अपनी तरफ़ से पारदर्शी था और हमेशा आलोचनाओं को रचनात्मक रूप में लिया। VP के पद पर होते हुए सारी बाधाओं को पार करते हुए निस्वार्थ भाव से काम करना बहुत ज़रूरी है और मैंने वह सीखा भी। मैंने काफ़ी चीज़ें लागू करवायीं जिनमें से कुछ काफ़ी सफल रहीं। उनमें से एक IR Cell है। जब मैं थर्ड ईयर के अंत में VP बना, उसी समय के आसपास हमारे कैंपस में विनोद गुप्ता आये थे। विनोद गुप्ता के साथ मेरे बहुत अच्छे सम्बन्ध रहे। उस समय मैं उनके बारे में ज़्यादा नहीं जानता था। हमारी पहली मुलाकात पर उन्होंने मुझे एक नया iPhone भेंट किया था। मैंने उनको RK हॉल दिखाया और केजीपी और VGSOM के बारे में उनसे चर्चा की। वापस जाते जाते उन्होंने मुझे अपनी खुद की घड़ी भी उपहार की तरह दे दी और चले गए। इससे पहले कि मैं उनको एक धन्यवाद का सन्देश लिखता, मुझे उनकी तरफ़ से एक ईमेल आया जिसमें उन्होंने मुझे अपनी कंपनी में काम करने के लिए USA बुलाया था। उन्होंने मुझे एक महीने में वीज़ा बनवाकर दिया और मुझे उनकी कंपनी में इंटर्न करने का अवसर मिला। मेरे विनोद गुप्ता के साथ अच्छे सम्बन्ध बन गए। उन्होंने फोर्थ ईयर के अंत में भी मुझे अपनी दूसरी कंपनी में इंटर्न के लिए बुलाया। उन्होंने वहाँ पर USA की संस्कृति को जानने के लिए मेरे घूमने और रहने का प्रबंध भी किया। मेरे लिए वह एक बहुत अच्छा अनुभव रहा। जहाँ तक VP के कार्यकाल की बात है, मैं मानता हूँ कि मैंने बहुत सारे काम किये और अपना सर्वोत्तम दिया, पर शायद लोगों को मुझसे और ज़्यादा अपेक्षाएँ थीं जो मैं पूरी नहीं कर पाया। शायद एक वर्ष की अवधि एक बड़ा परिवर्तन लाने के लिए काफ़ी कम है। जब तक हम सिस्टम को अच्छे से समझने लगते हैं, हमारा कार्यकाल ख़त्म होने को आ जाता है। मुझे ऐसा भी लगता है कि मेरे इन पांच सालों में जितने भी VP आये उन्होंने एकदम दिल लगाकर काम किया है। सबका केजीपी के प्रति एक अलग दृष्टिकोण था और मैं मानता हूँ कि हमें उनके दृष्टिकोण का सम्मान करना चाहिए। मैं मानता हूँ कि शोवन, पुंज, अपूर्व और रिंशुल - सबने केजीपी के लिए बहुत निस्वार्थ रूप से काम किया। फिफ्थ ईयर में मुझे प्लेसमेंट के लिए बैठना सही नहीं लगा। मैं अभी भी निश्चित नहीं हूँ कि मुझे आगे क्या करना है। मैं उसी पथ पर नहीं जाना चाहता था जहाँ पर सब जा रहे हों और जो पथ मुझे पसंद न हो। जब तक मुमकिन हो पाए, मैं तब तक परिस्थितियों को नज़र में रखते हुए चलना चाहता हूँ। अगर मैं अपने हॉल की बात करूँ, तो RK मेरे लिए एक परिवार की तरह है और RK का मेरे जीवन में बहुत बड़ा योगदान रहा है। मैं हमेशा कोशिश करता आया हूँ और करता रहूँगा कि मैं RK को जितना ज़्यादा वापस दे सकूँ उतना दूँ। परन्तु RK ने मुझे जो दिया है, मैं उसके लिए हमेशा ऋणी रहूँगा। अगर मैं यहाँ पर वर्तमान में सीनियर-जूनियर के बीच मित्रता की बात करूँ तो मुझे ऐसा लगता है कि अब वे परिवार वाली भावनाएं कहीं न कहीं लुप्त होती जा रहीं हैं। जो सीनियर-जूनियर के बीच सम्बन्ध मेरे समय पर हुआ करते थे वे अब कम हो रहे हैं। मुझे मेरे सीनियर्स से एक प्रेरणा मिलती रही जिसकी वजह से मैंने वे सब चीज़ें भी करने का प्रयास किया जो मैंने शायद कभी नहीं किया होगा और उनमें से काफ़ी चीज़ें मुझे पसंद भीआयीं। मैंने सबसे ज़्यादा अपने सीनियर्स से ही सीखा है और इसलिए मैं मानता हूँ कि सीनियर्स से बातचीत करना बहुत ज़रूरी है। मुझे ऐसा लगता है कि अब दूसरों की सहायता करने का भाव लोगों में कम होता जा रहा है और सब केवल अपने बारे में ही सोच रहे हैं। हमारे केजीपी का आदर्श वाक्य ही है - "योगः कर्मसु कौशलम्" जिसका मतलब "कर्म में उत्कृष्टता ही योग है" है, न कि "पढ़ाई में उत्कृष्टता ही योग है"। मेरे हिसाब से सभी को उस क्षेत्र में श्रेष्ठ होना चाहिए जिसमें उनकी दिलचस्पी हो। अंत में, मैं यह कहना चाहूँगा कि एक यात्रा के गंतव्य से ज़्यादा उस यात्रा को अच्छे से पूरा करना ज़्यादा ज़रूरी है। केवल सफलता को देखना ही ज़रूरी नहीं है, तुम्हें सफलता के मार्ग पर आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ना चाहिए और हार एवं जीत दोनों को स्वीकार करना आना चाहिए। तुम्हें दूसरों से प्रभावित नहीं होना चाहिए और सबकी राय लेकर अपने खुद का दृष्टिकोण बनाना चाहिए। केजीपी में तुम जो करना चाहते हो, तुम्हें हर क्षेत्र में प्रेरणा का स्रोत मिल जायेगा। चाहे वह यहाँ के एलुमनाई हों या यहाँ का वर्तमान छात्र। तुम्हें केवल उनसे बात करनी है और सीखना है। और अगर तुम कुछ नया कर रहे हो तो तुम यह सोचो कि तुम आने वाले छात्रों के लिए प्रेरणा बनने का काम कर रहे हो। मैं अपने केजीपी के पूरे परिवार और सारे KGPians को भविष्य के लिए शुभकामनायें देता हूँ।

Bhupender Singh

|| Civil Engineering ||

|| LBS Hall ||

केजीपी का अनुभव कुल मिलाकर मेरे लिए काफी मज़े से भरपूर रहा है। यहाँ बिताया वक़्त काफी यादगार रहेगा। प्रथम वर्ष में मेरा ज्यादा समय प्रवाह में गुजरा, मेरी जिंदगी का पहला नाटक था "क्या दिल्ली, क्या लाहौर"। उस नाटक की वजह से ही मेरा स्टेज का डर दूर हुआ। लोगों के सामने खुलना, उनसे बातें करना, सब उस नाटक ने ही सिखाया। प्रथम वर्ष में अपने हाल का नाटक सेक्रेटरी भी रहा जिसने भी बहुत कुछ सिखालाया। तृतीय वर्ष तक मुझे पता चल गया था कि मुझे IAS करना है, इसलिए मैंने अपना ध्यान पढ़ाई की तरफ मोड़ लिया। हालॉंकि, मुझे बाद में पता चला कि कॉलेज के साथ तैयारी कर पाना मुश्किल है, इसलिए उसे कॉलेज के बाद करने की सोच रखी है। मैं अभी भी पीछे पलट कर देखता हूँ तो दोस्तों के साथ की हुई मस्ती, हर रोज़ क्लास के बाद टिक्का पर बैठना, वीकेंड पर कैंपस से बाहर निकल जाना, परीक्षा के समय मारे हुए नाईट आउट्स - यह सब बहुत याद आते हैं। इच्छा होती है कि काश वो समय वापस लौट कर आ जाये। जाते जाते केजीपी में कुछ दो-तीन बदलाव भी देखना चाहूंगा। सबसे पहला, पाठ्यक्रम को थोड़ा लैब ओरिएंटेड बनाया जाए जिससे ज्यादा लाभ होगा, और दूसरा, शाम को टेक बाज़ार के लिए एक बस चलाई जाये जिससे बहुत सारे छात्र-छात्राओं का वक्त बचेगा। अपने जूनियर्स के लिए मेरी सलाह यही है कि यह आज़ादी और ऐसे दोस्त फिर नहीं मिलेंगे। इसलिए, ज़िन्दगी जितनी जीनी है, जी लो। अंत में मै केजीपी को धन्यवाद देना चाहूंगा। मैं आज जो भी हूँ, इसकी वजह से ही हूँ।

Bhupendra Bule

|| Industrial and System Engineering ||

|| RK Hall ||

केजीपी की पांच साल की जिंदगी एक सपने की तरह थी जिसमें मैंने अपने आप को सही तरह से समझा है| यहां सभी प्रकार के लोगों से मुलाकात होती है और सबसे कुछ न कुछ सीखने को मिलता है| यहां पर सीनियर्स, प्रोफेसर्स, और एलुमनाई, आदि लोगों के साथ बहुत अच्छी नेटवर्किंग हो जाती है, जो आगे की जिंदगी के लिए बहुत उपयोगी साबित होती है| इतने प्रतिष्ठित लोग गेस्ट लेक्चर्स देने आते हैं| शोध करने के लिए हमारे पास संसाधनों की कमी नहीं है| कहने का मतलब यह कि हमारे जीवन को संवारने के लिए जो कुछ भी जरुरी है, यहां पर सब उपलब्ध है; बस जरुरत है तो खुद को पहचानने की, कि किस क्षेत्र में हम अच्छा कर सकते हैं| प्रथम वर्ष में तो मैं पूरा मजे के मूड में ही था कि खुद को हर क्षेत्र में आज़माना है| दूसरे साल में ओपी ने मेरे व्यक्तित्त्व को बहुत हद तक बदल दिया| ईगो से संबंधित सारी समस्याएं ख़त्म हो गयीं| तीसरे साल में मैं हॉल में मेस का जनरल सेक्रेटरी बना और इस जिम्मेदारी को निभाने के दौरान मैंने बहुत कुछ सीखा| लोगों कि आलोचनाओं को सकारात्मक तरीके से लेने लगा और उन्हें जवाब देने के लिए अपने काम का सहारा लिया| चौथे साल में लगा कि करियर के बारे में थोड़ी गंभीरता दिखानी चाहिए| उस समय मैंने फॉरेन स्टूडेंट एक्सचेंज प्रोग्राम के लिए डीन को अर्जी दी थी और बहुत कोशिश भी की, पर उस समय उन्होंने इसे गंभीरता से नहीं लिया था| आज ख़ुशी होती है कि सेमेस्टर अवे प्रोग्राम के साथ यहां के छात्र बाहर अपने पसंद कि जगह पर पढ़ सकते हैं| पांचवें साल के पहले सेमेस्टर में भले ही प्लेसमेंट का लोड था, पर दुसरे सेमेस्टर में सब कुछ पीस महसूस हुआ और अपने मन मुताबिक बहुत सारी चीज़ें करने लगा जो अपने फर्स्ट ईयर में मैं नहीं कर पाया था| मैं क्या, सभी लोग ऐसा ही करते है| जिन्होंने बैडमिंटन रैकेट को कभी हाथ नहीं लगाया, वे बैडमिंटन खेलना शुरू कर देते हैं| मैं अभी वायलिन बजाना सीख रहा हूँ| केजीपी हमेशा से मेरे लिए आज़ादी का दूसरा नाम रहा है| जूनियर्स को यही सुझाव देना चाहूंगा कि खुद को सही तरीके से समझने की कोशिश करो और अपनी प्रतिभा पहचानकर उस क्षेत्र में जितना सीखना चाहो उतना सीख लो, क्योंकि यहॉं पर बिताया गया समय अनमोल है|

Deepak Vasman

|| Humanities and Social Sciences ||

|| RK Hall ||

केजीपी ने मेरे जीवन को एक सही दिशा दी है और मेरे व्यक्तित्त्व को पूरी तरह से निखारा है। यूँ कहें तो पांच साल अगर किसी भी जगह पर रहो तो आपमें बदलाव तो अवश्य देखने को मिलेंगे, पर यहाँ पर आकर मेरे अंदर जो भी बदलाव हुए हैं, सभी ने मुझे चतुर्दिक विकास की ओर अग्रसर किया है। प्रथम वर्ष में तो प्रत्येक क्रियाकलाप में भाग लेने का मन करता था और मुझे जब भी मौका मिलता था, हॉल में चल रहे किसी इवेंट की चर्चा में शामिल हो जाता था और सीखने की कोशिश करता था। द्वितीय वर्ष में लैपटॉप ख़रीदा और तेज इंटरनेट की चपेट में आ गया। मुझे फिल्मों में बहुत रूचि थी, सो मैं अलग-अलग भाषाओं की फ़िल्में देखा करता था एवं एक दो दोस्तों के साथ मिलकर उनपर प्रतिक्रियाएं देता था। दो सालों में सच्चे दोस्तों की पहचान हो जाती है और एक अच्छा फ्रेंड सर्किल बन जाता है जो जिंदगी भर रहेगा और हमें अपने हर मुकाम पर बहुत सारी पुरानी यादों को ताजा करेगा। पांच सालों में ही लगता है कि हमने इतनी सारी यादें संजो ली हैं कि जीवनभर उन्हें सहेजकर रख लूंगा और पांच सालों के जीवन को मैं सारी जिंदगी भी अलफ़ाज़ में गूंथता चला जाऊँ तब भी बयां नहीं कर पाउँगा। हम सभी गोवा और केरल घूमने गए थे और मुझे लगता है कि वहाँ बिताया हुआ हर पल याद है। जैसे जैसे समय बढ़ता चला जाता है, लोग अपने करियर की तरफ ध्यान देने लगते हैं। मैंने भी वही किया पर फिर भी हॉल के कुछ इवेंट्स में भी शामिल रहा। केजीपी हमें सारी सुविधाएँ मुहैया करवाता है, बस हमें उनका सही इस्तेमाल करना चाहिए। ये तो अच्छी बात है कि यह किसी महानगर में नहीं है, इसीलिए हम अपना सारा समय कैंपस में गुजारते हैं और अपनी रूचि को सही तरह से पहचान पाते हैं। जहाँ तक सोसाइटीज का सवाल है, उनसे बहुत कम लोगों को फायदा पहुँचता है क्योंकि उनकी चयन प्रक्रिया में नौसिखियों के लिए शायद ही स्थान रहता है। हमें सीखने को जो कुछ भी मिलता है, वह हॉल में मिलता है, जहाँ पर हम अपनी रूचि के हिसाब से कहीं भी भाग ले सकते हैं और जाहिर है कि सीनियर्स हमें फंडे देने में कभी हिचकते नहीं हैं।

Dhruv Jain

|| Computer Science and Engineering ||

|| RP Hall ||

मैं केजीपी में बिताये गए समय के दौरान खुद में निरंतर होने वाले अच्छे बदलावों को देखता आया हूँ। मेरे लिए केजीपी एक उपजाऊ बगीचे की तरह है जिसने मुझे अच्छे वातावरण में रखकर एक फलवान वृक्ष की तरह बनाया है क्योंकि प्रथम वर्ष में मैं बस एक अंकुरित बीज के समान था। शुरुआत के दिनों में मैं खुद को काफी अकेला महसूस करता था, पर धीरे-धीरे लोगों से दोस्ती करके मुझमें फर्क आया। केजीपी में एकेडमिक्स एक प्रमुख पहलु होता है। मैंने अपने प्रथम वर्ष के बाद मैकेनिकल से कंप्यूटर साइंस में डिपार्टमेंट बदला। मैंने यहाँ आने के बाद अपने शौक को भी ज़ारी रखा। स्कूल के दिनों से ही बैडमिन्टन खेलता था तो उसी को आगे बढाया क्योकि यहाँ हर तरह की सुविधाएँ उपलब्ध हैं। हॉल के लिए जी.सी. बैडमिन्टन में गोल्ड लाने का अनुभव मेरे लिए हमेशा ही ख़ास बना रहेगा। आगे मैं बैडमिन्टन टीम का कप्तान भी रहा। मैंने डम्ब-शराज जैसे मनोरंजक कार्यक्रम में भी अपने दोस्तों के साथ ओपन आईआईटी स्तर पर भाग लिया। मेरी जिंदगी में भी काफी परेशानियां आती रहीं, पर मैने उन सभी को अच्छे से संभालना सीखा। मैं पांच सालो से योगा और ध्यान (मैडिटेशन) करता आया हूँ जिससे मेरे मन को बहुत शांति मिलती है। मुझे एकेडमिक्स में एक बदलाव की जरुरत महसूस होती है। वह यह कि सभी डिपार्टमेंट में कुछ ख़ास विषय औद्योगिक स्तर पर पढ़ाये जाने चाहिए। मेरी राय है कि यहाँ आकर हम सभी को अपने उन सभी क्षेत्रों को मजबूत करना चाहिए जिनकी वजह से हमारा व्यक्तित्व असम्पूर्ण सा लगता है। मेरे लिए यहाँ बिताये गए पांच वर्ष अमूल्य हैं। वे मेरी ज़िन्दगी की यादों में सबसे चमकदार एवं रंगीन रहेंगे।

Drishti Hora

|| ||

|| SN/IG Hall ||

आज जब मैं खुद को पीछे मुड़कर देखती हूँ तो यकीं नहीं होता कि मैं वही चार साल पहले वाली शर्मीली, शांत, सीधी लड़की हूँ जो आज पूरी तरह से बदल गयी है। चूँकि मैं एक रूढ़िवादी परिवार से हूँ, केजीपी आने से पहले मैं बहुत अलग सोचती थी। लोगों को उनके व्यवहार और उनकी आदतों से तौलती थी। पर आज वही आदतें मुझे बहुत आम लगती हैं। नए लोगों से हाथ मिलाना तो दूर, बात करने से भी हिचकिचाती थी। लेकिन आज वही अनजान लोग मेरे बहुत अच्छे दोस्त हैं और आज मैं बेझिझक किसी से भी घुल मिल सकती हूँ। मैं आज इतनी बदल पायी हूँ क्योंकि मेरे आस पास ऐसे लोग रहे जिन्होंने हमेशा मुझे सहज महसूस करवाया है। मैं प्रवाह और एलुमनाई सेल का हिस्सा रही हूँ और वहाँ मिले सभी लोगों से मुझे अलग ही लगाव है। केजीपी में मैं जितना हल्का और आज़ाद महसूस करती हूँ, वैसी आज़ादी मुझे कहीं नहीं मिली। चुपके से बिल्डिंग की दीवारें फाँदना, रात-रात भर सड़को पर बेफिक्र होकर घूमना, छेदिस की चाय के साथ सुबह की शुरुआत करना - सब कुछ बहुत याद आएगा मुझे। एक समय था जब मैं बहुत अकेली हो गयी थी क्योंकि मेरे ज्यादा दोस्त नहीं बन पाए थे। ज्यादातर समय अपने कमरे में अकेली बैठी रहती थी। तब निशिता ने मेरी मदद की, मुझे अपने दोस्तों से मिलवाया, मुझे फिर से अपने साथ बाहर निकाला और आज उन्हीं में से कुछ लोग मेरे दिल के बहुत करीब हैं। इसलिए मैं सबसे यही कहना चाहूँगी कि ज्यादा से ज्यादा दोस्त बनाएँ, खासकर उन्हें जो खुद को केजीपी में रहकर भी अकेला महसूस करते हैं। यहाँ रहकर कोई भी, कभी भी अकेला नहीं महसूस कर सकता है। केजीपी में यही दोस्त आपकी जिंदगी में रंग भरेंगे। जो लोग खुद को अलग मानते हैं, उन्हें भी खुद आगे बढ़कर लोगों के साथ घुलना मिलना चाहिए। हो सकता है आगे चलकर यही लोग आपकी जिंदगी का कभी न भूलने वाला हिस्सा बन जाएँ।

Gautam Prasad

|| ||

|| RP Hall ||

ऐसे बहुत लोग हैं जो केजीपी में आने से पहले ही अपने स्कूल के दिनों में पढ़ाई के अतिरिक्त काफी कुछ सीख कर आते हैं किन्तु मैं ऐसा बिलकुल नहीं था। फिर यहाँ आकर मैंने बहुत कुछ सीखा। पहले मैं साहस से बोल भी नहीं पाता था। मैं कभी स्टेज पर गया ही नहीं था। यहाँ पर मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि अब मैं घबराता नहीं हूँ। पहले मैं बहुत घबराता था, कुछ भी नया करने से घबराता था। एक बात मैं कहना चाहूँगा कि मैंने जो कुछ भी किया हो यहाँ पर, जो कुछ भी सीखा हो, हर जगह सीनियर्स ने मेरी काफी मदद की। यह कहना गलत नहीं होगा कि अगर आज मै यहाँ से कुछ सीख कर जा रहा हूँ तो उसमें मेरी मेहनत के साथ साथ सीनियर्स के परोपकार का भी बड़ा हाथ है। मुख्य रूप से मैं दो सीनियर्स का नाम लेना चाहूँगा, समर दा और सनिकेश दा, जिन्होंने मेरे एक अच्छे एथलिट बनने में काफी मदद की है। शुरू शुरू में मैंने बहुत चीज़ों में हिस्सा लिया और जितना हो सका उतनी चीज़ों को एक्स्प्लोर किया। मैंने कोरियो, वेट लिफ्टिंग, हॉकी, एथलेटिक्स आदि में हिस्सा लिया। मैंने एक स्टार्टअप भी शुरू किया था और मैं उसमें स्पॉन्सरशिप का काम संभालता था। इधर उधर से पैसे जुगाड़ने में भी काफी मज़ा आता था और बहुत कुछ सीखा भी। फर्स्ट ईयर में हम लोग बिलकुल बिंदास होकर मस्ती करते थे और किसी बात की शर्म नहीं करते थे। मैंने कभी नहीं सोचा कि लोग क्या सोचेंगे। किन्तु जब थोड़े बड़े हुए तो लगने लगा कि अब अगर कुछ बेवकूफी या मस्ती करेंगे तो फच्चे या जूनियर्स क्या सोचेंगे। थर्ड ईयर में मेरा स्पोर्ट्स में प्रदर्शन सबसे शीर्ष पर था। उस समय मैं स्वर्ण व रजत पदक भी जीता था। रजत पदक से तो जैसे मेरा कुछ पुराना नाता है। पिछले कुछ सालों से कोरियो में लगातार रजत ही आ रहा है। पिछली बार स्वर्ण पदक आने की पूरी सम्भावना थी किन्तु कुछ गलती हो गयी थी और कुछ अंक काट लिए गए थे और अंततः रजत पदक मिला। रजत पदक से तो अब दर सा लगने लगा है। इल्लु में भी रजत ! मैं अपनी ज़िंदगी का अच्छे से आनंद लेता हूँ और खूब मस्ती करता हूँ। मेरा ऐसा मानना है कि भगवान ने ज़िंदगी दी है तो आनंद लेने के लिए। केजीपी में मेरा अधिकतर समय ज्ञान घोष में ही कटा है। यहाँ से जाने के बाद मै ज्ञान घोष को हमेशा याद करूंगा। मेरे लिए वह बहुत प्रिय जगह है। मै जब भी वहाँ जाता हूँ, हमेशा प्रणाम करके ही प्रवेश करता हूँ। एक ऐसी जगह होती है जिसे देखकर आप में थोड़ा जोश आ जाता है, ज्ञान घोष मेरे लिए वही जगह है। वहाँ हम हॉकी खेलते थे और कई बार तो ऐसा भी होता था कि पूरा दिन वहीं रहते थे। मैंने एथलेटिक्स में भी हिस्सा लिया और मुख्य रूप से 1500 मीटर की रेस दौड़ता था। उसमें एक बार मैंने स्वर्ण पदक भी जीता है। उस जीत की कहानी भी बड़ी रोचक है जो मैं सदैव ही याद रखूंगा। उस रेस में एक बड़ा ही प्रतिभाशाली एथलिट था - गौरव शिनॉय। उसे हराना बहुत मुश्किल था। उस समय रेस शुरू होने से पहले मैं यह सोच रहा था कि कुछ आएगा या नहीं आएगा। तब मेरे दोस्त अंश मिश्रा ने मेरा उत्साह बढ़ाया और फिर तो जैसे चमत्कार ही हो गया। अंतिम सेकंड तक गौरव मुझसे आगे था किन्तु मैंने उसे अंतिम पलों में हरा दिया था। उस पल मुझे जो ख़ुशी हुई थी, वह मैं कभी नहीं भूलूंगा। हालाँकि अगले ही दिन 5 km की रेस में एक सेकंड ईयर के छात्र कैलाश मुझसे आगे निकल गया था। मेरा दोस्त सेक्रेटरी था तो उसके पास ज्ञान घोष के रूम की चाभी थी और उस चाबी का उपयोग कर हमने ऐसी चीज़ की कि मै कभी नहीं भूलूंगा। हम तीन चार दोस्त रात को शान्ति से ज्ञान घोष गए और अचानक से सारी लाइट्स चालू कर दी। फिर जो मज़ा आया वो हमेशा याद रहेगा। हमने यहाँ केजीपी में बहुत अच्छी संस्कृति बनाकर रखी है। इल्लू जब जलता है और जब सभी एक साथ देखते हैं तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं, दिल की धड़कनें तेज हो जातीं हैं।

Gyandeep Kumar

|| Mining Engineering ||

|| Patel Hall ||

खड़गपुर मेरा अलमामेटर भर नही है। यह मेरी ज़िंदगी के सबसे खूबसूरत मोड़ का हिस्सा है। पटेल हॉल, माइनिंग इंजीनियरिंग, आवाज़ और क्राइ ने मुझे वो यादें दी हैं जिससे मैं अपने आप को एक बेहतर इंसान बनते हुए देखता हूँ। प्रथम वर्ष केजीपी को जानने और कैम्पस की ज़िंदगी समझने में निकल गया। द्वितीय वर्ष में मैंने पटेल हॉल के कार्यक्रमों में भाग लेना शुरू किया, साथ ही साथ मेरा आवाज़ में भी चयन हो गया। मैने अपने द्वितीय वर्ष में हॉल के वी.पी. कैंडी की पब्ली से लेकर हॉल की तरफ़ से ड्राम्स में भाग लिया। साथ ही साथ क्रिकेट खेलना भी शुरू किया। इस साल काफ़ी जगह संलग्न होने के कारण काफ़ी लोड झेलना पड़ रहा था, लेकिन इसका निष्कर्ष यह निकला कि मैं समय का सदुपयोग करना सीख गया। तीसरे साल से मैंने अपनी राह ढूंढ़नी शुरू कर दी जो मुझे मेरी मंज़िल तक ले जाए। और अब जब मैं यहाँ से जा रहा हूँ तो लगता है यहाँ अपनी राह के इसी मोड़ में थम जाऊँ। मेरी केजीपी की ज़िंदगी के हर वो पल जिसमें मैंने जीत के शोर और हार की खामोशी को महसूस किया, उम्र भर याद रहेगा। यहाँ की जनता को बस इतना सन्देश देना चाहता हूँ कि यहाँ से तुम सिर्फ़ डिग्री लेकर ही कुछ सीख कर नहीं निकलते हो। इसलिए जितना खुद को बनाना है, बनाकर निकलो। सी.जी. और सी.वी. अपने आप बन जाएँगी।

Harsh Gupta

|| Mathematics and Computing ||

|| Azad Hall ||

मैं दिल्ली का रहने वाला हूँ। जब मैं पहली बार केजीपी आया तो मुझे इस परिवेश से ताल-मेल बिठाने में काफी वक्त लगा। वैसे जेइइ कोचिंग के शिक्षक ने हमें पहले से ही आईआईटी में काफी सारी कहानियां सुना रखीं थीं, इसलिए हमें पढ़ाई-लिखाई के मामले में सामंजस्य बैठने में कोई परेशानी नहीं हुई। हालांकि मैंने कभी भी आईआईटी से ज्यादा लम्बी चौड़ी उम्मीदें नहीं रखीं थीं। पहला वर्ष तो कैंपस को एक्स्प्लोर करने में बीत गया। दूसरे वर्ष में मैं AGV और आवाज़ का सदस्य बना।इस वर्ष मैं हॉल के लिए GC में हॉकी भी खेली। इसी वर्ष (2014 की गर्मियों में) मैं गूगल समर ऑफ़ कोड के लिए भी चुना गया। यहीं से मेरी कोडिंग की राह को एक नयी दिशा मिली। तीसरे साल के अंत में मैंने अपने साथियों के साथ मिलकर मेटा-केजीपी का निर्माण किया। चौथे वर्ष में मैं हॉल के डाटा एनालिटिक्स का कप्तान भी बना। मुझे याद है कि OP से बचने के लिए मैं दो-दो सप्ताह तक LBS चला जाया करता था। मैं और मेरे दोस्त ने उस वक्त मिलकर No Abuse KGP नाम का फेसबुक पेज भी बनाया था। हालांकि मैं यह जरूर कहूँगा कि हॉल कि गतिविधियाँ काफी महत्वपूर्ण होतीं हैं, पर मुझे OP के तौर तरीके कभी पसंद नहीं आये। मैं सभी को यही सन्देश देना चाहूंगा कि अपनी अपनी रूचि के अनुसार दिल लगाकर काम करें और कभी भी हिम्मत न हारें।

Karthikeyan Kuppu

|| Architecture & Regional Planning ||

|| LLR Hall ||

मैं आज जो भी हूँ केजीपी की संस्कृति के कारण ही हूँ। मेरी परिपक्वता के विकास का श्रेय मैं यहाँ के अच्छे परिवेश को देना चाहता हूँ। मुझे पहले से ही रचनात्मक क्षेत्र में रूचि थी, वह क्षेत्र जिसमें इंजीनियरिंग और कला दोनों का ही मिश्रण हो। इसलिए केजीपी का आर्किटेक्चर विभाग मेरे लिए सबसे श्रेष्ठ विकल्प था। प्रथम वर्ष से ही यहाँ के प्रतियोगी पर्यावरण ने मेरे व्यक्तित्व को विकसित करने में अहम योगदान दिया है। मैंने कभी उम्मीद नहीं की थी कि मैं पढ़ाई-संबंधी चीज़ों से बाहर निकल कर सोसाइटी (AIESEC) में भी शामिल हो जाऊंगा। प्रथम वर्ष के अंत तक मैं अपने विभाग के सभी छात्र और अधिकांश सीनियर्स को जानता था। उस काल में मैंने अपनी रूचि ढूंढ़ते हुए कोडिंग, अल्गोरिथम और स्टैटिस्टिकल एनालिसिस पर अतिरिक्त समय देना शुरू कर दिया। दो चीज़ों का मुझे बड़ा शौक है, पहला घूमना और दूसरा संगीत। मैं तरह साल से वायलिन बजा रहा हूँ और बांसुरी मैंने यहाँ आकर सीखी। इसी रूचि के कारण द्वितीय वर्ष की शुरुआत में मैंने ETMS में शामिल होने की सोची और हो भी गया। अपने हॉल के लिए भी मैंने काफ़ी सारी स्पर्धाओं में भाग लिया और ढेरों पदक जीते। मैं संगीत के अंतर हॉल प्रतियोगिताओं में अपने हॉल का कप्तान भी रहा हूँ । अपने द्वितीय वर्ष में मैंने किसी शोध क्षेत्र में इंटर्नशिप करने की सोची थी, परन्तु ऐसा नहीं हो पाया। थर्ड ईयर में शैक्षणिक दबाव बढ़ने के कारण मुझे AIESEC छोड़ना पड़ा, परन्तु संगीत में अत्यंत रूचि होने के कारण मैं ETMS से जुड़ा रहा। आखिरकार अपने तृतीय वर्ष में मैंने स्पेस मैट्रिक्स में इंटर्नशिप किया जिसमें मुझे अपनी कार्य कुशलता को बढ़ाने का मौका मिला। अपने सातवें सेमेस्टर में मैंने बर्कले, कैलिफ़ोर्निया में अपनी इंटर्नशिप की। वह समय काफ़ी अलग था | वहाँ मुझे वित्तीय स्वतंत्रता के साथ-साथ जिम्मेदारी का भी आभास हुआ। मैंने बर्कले और MIT में आगे की पढाई के लिए आवेदन किया। अपनी प्रोफाइल के अनुसार मुझे बर्कले में दाखिला मिलने की ज्यादा उम्मीद थी परन्तु दाखिला मुझे MIT में मिला। केजीपी ने मुझे इन पाँच वर्षों में पूरा बदल दिया। आप यहाँ जितने ज्यादा लोगों से मिलोगे, आपकी परिपक्वता का उतना ही विकास होगा। यहाँ अपनी रूचि की खोज करते-करते आपको पता चल जाता है कि आपको जीवन में करना क्या है। ETMS में मुझे आत्म संतुष्टि का आभास होता है। यहाँ आकर मैंने सीखा कि कैसे आप अपनी सामाजिक और शैक्षिक जीवन को संतुलन में रखें। मेरे इस सफर में काफी उतार चढ़ाव आये हैं। अपने बुरे वक़्त में मैं अपने दोस्तों से बातें करता था जो मुझे हमेशा प्रेरित करते थे। दोस्तों और सीनियर्स की प्रेरणा भरी बातें, कुछ प्रोफेसर्स का अच्छा साथ और केजीपी की इस संस्कृति ने मुझे सफल एवं परिपक्व व्यक्तित्व में गढ़ा है। मैं जूनियर्स को यह सुझाव देना चाहूंगा कि ज्यादा लोड मत लो, अपनी तरफ से मेहनत करते रहो, बाकी चीज़ें समय आने पर खुद हो जाएंगी।

Kartikeya Fatwani

|| Biotechnology ||

|| MS Hall ||

आईआईटी खड़गपुर ने मुझे बहुत सारी यादें दी हैं। शुरुआत से बताऊँ तो जब मैं केजीपी आया था तो मुझे कुछ ज्यादा उम्मीदें नहीं थीं। मैं अपने लिए अवसर तलाशना चाहता था लेकिन शुरुआत में ऐसा नहीं कर पाया। मैं अपने फर्स्ट ईयर के अंत में क्षितिज में शामिल हुआ और अपने थर्ड सेमेस्टर में मैं क्षितिज में काफी ज्यादा व्यस्त रहा और चौथे सेमेस्टर में जनरल सेक्रेटरी (टेक्नोलॉजी), जिमखाना के चुनाव में हिस्सा लिया। परन्तु पाँचवे सेमेस्टर में चीज़े गंभीर होने लगी और मैं भी अपना ध्यान एकेडेमिक्स में ज्यादा केंद्रित करने लगा। उस दौरान मुझे यह पता चला कि इंस्टिट्यूट आपको कुछ समय बाद पढ़ाई और एकेडेमिक्स में ज्यादा केंद्रित होने के लिए आकर्षित करेगा। मैं प्रोग्रामिंग और अन्य चीज़ो में शामिल रहने की कोशिश करता रहा और फिर तीसरे वर्ष के अंत में सॉफ्टवेयर इंटर्न की। "इफ यू आर स्मार्ट एंड इफ यू आर इन आईआईटी, यू विल गेट प्लेस्ड"। इंटर्न के बाद मैंने खुद को खोजना शुरू किया और आहिस्ता-आहिस्ता यह समझ आया कि अगर आप केजीपी में हो तो आपको बहुत सारे अवसर मिलेंगे। मेरे केजीपी की जिंदगी की सबसे अच्छी यादें इंग्लिश ड्रामेटिक्स के समय की हैं। घटनाक्रम कुछ इस प्रकार था कि हमारा अगले दिन ड्रामा था और हमारी टीम भी नहीं बनी थी। हम रात दस बजे नेताजी गए और टीम बना ली। तत्पश्चात सुबह चार बजे तक वेजीज़ में हम लोगो ने एक स्क्रिप्ट तैयार की और उसी रात दस बजे हम लोगों ने अभिनय किया और हमने कांस्य पदक भी हासिल किया। सातवें सेमेस्टर में इंटर्न के लिए हैदराबाद गया और वहाँ मुझे 'ओपन माइक' करने का अवसर प्राप्त हुआ जिसे करने के बाद मुझे अपने लिए एक नया करियर विकल्प मिल गया। 6 पॉइंटर होते हुए भी मैं अपने आप से संतुष्ट हूँ क्योंकि मैं जो चाहता था, मैंने वो किया और आगे भी करता रहूँगा। जूनियर्स के लिए यही कहना चाहता हूँ कि पढ़ाई करो, प्रेरित रहो और वास्तविक उम्मीदें रखो। "मेक योर ओन गोल्स, लिव अप टू योर लाइफ"।

Keshav Agarwal

|| Mathematics and Computing ||

|| RP Hall ||

केजीपी की तो बात ही निराली है। यहाँ तो हर पल ही यादें हैं। केजीपी में जब मैंने प्रवेश लिया तब मैं पहली बार घर से बाहर निकला था, लेकिन बहुत जल्द ही मैं यहाँ के वातावरण में संवर गया और अब सोचता हूँ कि पता नहीं पाँच साल कैसे बीत गए। केजीपी ने मेरे व्यक्तित्व को काफी निखारा। यहाँ आने से पहले मैं काफी कम बोलता था और अपने में ही मग्न रहता था। किन्तु अब बिलकुल बिंदास अंदाज वाला व्यक्ति बन गया हूँ। मुझे प्रथम वर्ष में ही समझ आ गया था कि अगर आप चुप रहोगे तो काम नहीं बनने वाला। यहाँ पर मैंने नाचना भी सीखा। फ्रेशर ट्रीट के अवसर पर तो हम सभी पागलों की भांति वस्त्रहीन होकर नाच रहे थे और एक दूसरे पर पानी फेंक रहे थे। वह मस्ती मुझे हमेशा याद रहेगी। यहाँ पर सीनियर और जूनियर के बीच का मेल-जोल मुझे शुरू से ही बड़ा पसंद था। कई बार हम सब साथ में ही हँसी मज़ाक करते हैं और एक ऐसा समय आ जाता है जब सीनियर जूनियर सब साथ मिलकर एक दूसरे की हँसी उड़ा रहे होते हैं। स्पोर्ट्स खेलते समय भी हम कभी किसी को छोटा बड़ा नहीं समझते और सबको बराबर ही मानते हैं। यहाँ पर सीनियर्स भी काफी मददगार हैं। कितनी बार तो फर्स्ट ईयर व सेकंड ईयर मिलकर फाइनल ईयर की हँसी उड़ा रहे होते हैं लेकिन हम कभी बुरा नहीं मानते। ऐसे में बड़ा ही प्यारा माहौल बन जाता है। वो हँसी मज़ाक वाला माहौल मुझे बहुत सुनहरा लगता था और मुझे हमेश याद रहेगा। यह देखना अच्छा लगता है कि यहाँ जूनियर्स डरकर नहीं रहते बल्कि निडर रहकर व विनम्रता के साथ सीनियर्स के साथ रहते हैं। क्रिकेट मुझे शुरुआत से ही पसंद था। केजीपी आने से पहले भी मैं काफी क्रिकेट खेलता था और यहाँ आकर तो क्रिकेट मेरा जूनून बन गया। शुरुआत में मैंने एथलेटिक्स में भी हिस्सा लिया था। यहाँ की संस्कृति भी मुझे बड़ी पसंद है और मैं यह उम्मीद रखूंगा कि यह बरकरार रहे। मैं केजीपी की सबसे अनोखी संस्कृति इल्लुमिनाशन एवं रंगोली का भी हिस्सा रहा। मेरा तो नाम भी 'रंगोली बॉय' पड़ गया था। मेरे केजीपी जीवन का एक बड़ा हिस्सा क्रिकेट से जुड़ा हुआ है जो मैं सदैव याद रखूंगा। मैं वो पल कभी नहीं भूलूंगा जब इंटर आईआईटी में हमने स्वर्ण पदक जीता था और वह पल भी जब मैं पहली बार हॉल की ओर से जी.सी. में खेला था। इंटर आईआईटी का वह एक पल था जब हम जीतने ही वाले थे और पूरा केजीपी एकजुट होकर हमारा प्रोत्साहन बढ़ा रहा था - वह पल तो मैं कभी नहीं भूल सकता। टाटा स्पोर्ट्स काम्प्लेक्स से भी मुझे काफी लगाव है। जब भी मुझे खाली समय मिलता था, मैं वहीं चला जाता था। मेरी डिपार्टमेंट से भी काफी यादें जुड़ी हुई हैं। मैं डिपार्टमेंट रैंक 1 था तो कभी भी किसी प्रोफेसर से कुछ भी काम होता तो मेरे सहपाठी हमेशा मुझे ही आगे कर देते थे। एक बार सभी ने प्रोफेसर से ब्रेक मांगने के लिए कहा। उन्होंने कहा कि तुम पहले बोलो और फिर हम सभी तुम्हारे पीछे साथ में बोलेंगे। पर मुझे क्या पता था कि कुछ और ही होने वाला है। मैंने भी उत्साह में आकर दो सौ बच्चों की कक्षा में अकेले ही जोर से ब्रेक की मांग की और किसी ने मेरा साथ नहीं दिया। सभी चुप थे। वो तो प्रोफेसर की कृपा थी कि उन्होंने ब्रेक दे दिया। थर्ड ईयर में जब माइक्रोसॉफ्ट में इंटर्न नहीं लगी थी तब मुझे यह बात दिल पर लग गयी। बस फिर तो ठान ली थी कि भड़ास निकालनी ही है और फिर मैंने माइक्रोसॉफ्ट में प्लेसमेंट ले ही लिया।

Kunal Deosarkar

|| Physics ||

|| Azad Hall ||

मैं केजीपी आने पर कोई बड़ी उम्मीदें बॉंधे नहीं था। बस जी भर कर फुटबॉल खेलना चाहता था। खुशकिस्मत था कि पहले ही वर्ष में मुझे आज़ाद हॉल मिला जिससे मैं कई सारी अलग अलग गतिविधियों में भाग ले पाया और इससे मेरे व्यक्तित्व को नये आयाम भी मिले। सीनियर्स और सभी के काफ़ी दोस्ताना व्यवहार से मैं बहुत खुश था। आज़ाद में रहकर अपने विंग में दोस्तों के बीच पीस का माहौल मेरे लिए अद्भुत था। यहॉं मैंने कार्टूनिंग, स्केचिंग, रंगोली, थर्माकॉल व क्ले मॉडलिंग़, फुटबॉल, स्विमिंग, वॉटरपोलो इत्यादि गतिविधियों में भाग लिया। साथ ही मैं spAts व स्पेक्ट्रा का भी हिस्सा रहा। हर बार मैंने अपने साथियों से जीवन की कोई न कोई अहम सीख हासिल की है। इसके लिए मैं उनका शुक्रगुज़ार हूँ। ओ.पी. के ज़रिये सीनियर्स से मेरी पहचान बढ़ी और मैंने उनकी गलतियों से भी काफी कुछ सीखा। आज मैं अपने अनुभव की वजह से ही अपने व्यक्तित्व का निर्माण कर पाया हूँ। मेरे लिए विशेषकर इंटर आईआईटी व जीसी फुटबॉल प्रैक्टिस के दिन काफी सुखद रहे। तब केवल खेल ही नहीं बल्कि टिक्का पर भाट का भी हम काफी आनंद लिया करते थे। इसके साथ ही इल्लू और रंगोली केजीपीयन्स के लिए खास अवसर होते हैं जब सभी लोग इतने बड़े स्तर पर कार्य करते हैं। सभी को गर्व के साथ इस टीम स्पिरिट का आनंद लेना चाहिए। मेरे लिए तो अब ऐसी रंगोली बनाने का मौका फिर कभी नहीं आएगा। मुझे ये अवसर सबसे ज़्यादा याद आएंगे। अंततः मैं सभी से यही कहूँगा कि यहॉं का समय अनमोल है। असफलता के डर से जीवन में भाग लेना मत छोड़ो। एकेडेमिक्स के लिए भी यही बात सच है कि गिरने पर ही तुम्हें आगे बढ़ने की हिम्मत मिलेगी। लेकिन अपनी रूचियों को पहचानने के लिए यहॉं के अवसरों का पूरा इस्तेमाल करो और जहॉं खुशी मिले, वहॉं पूरी ताकत से मेहनत करो। मेरा लिए जीवन के प्रति नज़रिया कुछ ऐसा है- “Ever tried? Ever failed? No matter. Try Again. Fail again. Fail better." - Samuel Beckett

Kunal Kulbhushan Jain

|| Industrial and System Engineering ||

|| LLR Hall ||

इस जगह से मेरी काफ़ी सारी हसीन यादें जुडी हैं| मेरे कुछ ही दोस्त हैं जिनके साथ मेरी ज्यादातर यादें हैं लेकिन वो दोस्त मेरे लिए काफी अहम हैं| बाकी चीज़ों का तो पता नहीं लेकिन वे दोस्त मुझे हमेशा याद रहेंगे| काफ़ी लोगों का मानना है कि यादें सिर्फ सोसाइटी या हॉल में ही बन सकती हैं लेकिन मेरे विभाग में भी मेरी काफ़ी सारी यादें हैं, काफ़ी सारे दोस्त मेरे विभाग के ही हैं| दो कक्षाओं के बीच के समय में काफ़ी कुछ ऐसा किया है जो हॉल या सोसाइटी में नहीं किया| मैं हमेशा कुछ न कुछ नया करता रहा जिस वजह से काफी सारे नए लोगों से रूबरू हुआ| विभिन्न प्रकार के लोगों की सोच से मैं अवगत हुआ, कुछ से सहमत हुआ तो कुछ से नहीं| इन सब चीज़ों का मुझे लगता है कि मुझे केजीपी से बाहर काफ़ी फायदा होगा| केजीपी का मज़ा इसी में सबसे ज्यादा है, तुम जितने ज्यादा लोगों से मिलोगे, उतना आनंद उठाओगे, उतना ही तुम्हें सीखने को मिलेगा| इतनी आज़ादी शायद ही कहीं और मिले, तो इसका फायदा सभी को उठाना चाहिए| मैं अपने प्रथम वर्ष से डिबेटिंग सोसाइटी में रहा हूँ, काफी वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में केजीपी का प्रतिनिधित्व किया और जीत हासिल की| दूसरे वर्ष में Data Torrent नामक एनालिटिक्स स्टार्टअप में इंटर्न किया था, काफी अच्छा अनुभव था| वहां काम करने की काफी आज़ादी मिली थी| तीसरे वर्ष में Deutsche Bank में मेरा CDC से इंटर्न लगा था और और उसी कंपनी से मुझे PPO भी मिला| हॉल के लिए भी काफी सारी स्पर्धाओं में मैंने भाग लिया है, जैसे वाद-विवाद, ऐलोक्यूशन, व्हॉट्स द गुड वर्ड ,केस स्टडी, क्विज, ऐड डिज़ाइन| इन सबके अलावा इल्लू और रंगोली में भी अपना योगदान दिया| यहाँ प्रोफेसर्स से भी काफ़ी बातें सीखी| OP के विषय में मेरा मानना है की जब तक यह सीमा में रहकर होता रहेगा, तब तक यह सही है क्योंकि सीनियर्स से बातचीत काफी ज़रूरी है| यहाँ के सीनियर्स काफी मददगार हैं, उनसे बात करो और जितना फायदा हो सकता है, उठना चाहिए| OP से बातचीत की शुरुआत करने में हिचकिचाहट दूर होती है, लेकिन किसी को आपके बर्ताव से तकलीफ नहीं पहुँचनी चाहिए | जूनियर्स को यह सन्देश देना चाहूंगा की आईआईटी में घुसने के बाद कभी भी निश्चिन्त न हो जाना, यहाँ आने के बाद अपने लक्ष्यों को पुनः निर्धारित करना ज़रूरी है| समय बर्बाद मत करो, मस्ती के साथ साथ पढाई भी काफ़ी ज़रूरी है, वरना मैंने बहुत सारे लोगों को देखा है जिन्हें बाद में पछताना पड़ता है| एक बदलाव जो यहाँ के लोगों के रवैये में देखना चाहूंगा वो है कि किसी भी चीज़ को बिना आज़माए उसकी आलोचना करना| अगर तुम किसी चीज़ को बदलना चाहते हो तो उस प्रणाली का हिस्सा बनो, फिर सोच समझकर अपनी राय दो| अगर तुमको लगता है कि कुछ गलत हो रहा है तो उसके विरुद्ध लड़ाई करो और कभी हार मत मानो|

M. Siddharth

|| Electronics & Communication Engineering ||

|| RK Hall ||

जब मैं फर्स्ट ईयर में आया था तब मैं एकदम पढ़ाकू किस्म का लड़का था। केजीपी की भाषा में कहा जाये तो एकदम 'मग्गू' किस्म का। मैं फर्स्ट ईयर में LBS हॉल में था। फर्स्ट सेमेस्टर में ही मैंने दस्सी मार ली थी और मुझे यह एहसास भी नहीं हुआ कि वास्तव में दस्सी मारना कितना मुश्किल है। सेकंड ईयर में RK हॉल आने के बाद समझ आया कि यहाँ पर पढ़ाई से ज़्यादा कुछ और भी है: हॉल कल्चर। LBS में हॉल कल्चर जैसा कुछ ज़्यादा नहीं था और शायद इसलिए मैं पढ़ाई की तरफ़ ज़्यादा उन्मुख था। सेकंड ईयर में मुझे OP में मुझे बहुत मज़ा आया। OP से सबसे ज़्यादा फ़ायदा मुझे यह मिला कि मैं अपने सीनियर्स को और बैच के लोगों को जान पाया। मैंने यहाँ पर GC में भी बहुत सक्रिय रूप से हिस्सा लिया। मैंने मैथमेटिक्स ओलिंपियाड में भी हिस्सा लिया। मुझे नाटक में बहुत रुचि थी और मैंने फोर्थ ईयर तक उसमें भाग लिया। मैं हॉल में ड्रामेटिक्स का कप्तान भी रह चुका हूँ। सेकंड ईयर में मैं AGV में भी था पर मैं ज़्यादा समय तक वहाँ काम नहीं कर पाया। सेकंड ईयर के अंत में मैंने G.Sec. टेक. बनने के लिए चुनाव लड़ा। उस वक्त मैं बहुत व्यस्त रहता था क्योंकि SOP की तैयारी, हॉल डे पर जाकर प्रचार करना और साथ ही कक्षायें भी जाना बहुत मुश्किल था। वह सब भी एक निश्चित ड्रेस कोड में। मैं जीत नहीं पाया और मुझे काफ़ी समय तक वह बात स्वीकार नहीं हो पा रही थी। मैं चुनाव के बाद KDAG से जुड़ा। मैंने आगे जाकर दो बार FT भी मारी - एक बार मैं जर्मनी गया था और दूसरी बार कनाडा। मुझे बाहर घूमने का बहुत शौक था और बाहर जाने का कोई मौका नहीं छोड़ता था। मैं HPAIR के लिए USA गया था। मुझे AI में भी बहुत दिलचस्पी थी और इसलिए मैं 'डाटा साइंस गेम' नाम से एक प्रतियोगिता के लिए पैरिस भी गया था। मेरी प्लेसमेंट माइक्रोसॉफ्ट रेडमंड में हुई। मैं प्रौद्योगिकी में आगे बढ़ना चाहता हूँ और बाद में खुद का स्टार्टअप खोलना चाहता हूँ, पर उससे पहले मैं जॉब का अनुभव पाना चाहता हूँ। फिफ्थ ईयर में मैं Inter IIT Tech के लिए भी गया और हमें सिल्वर मिला। वह एक अच्छा अनुभव रहा। मैं टीमवर्क में बहुत विश्वास रखता हूँ और मुझे लगता है कि टीमवर्क से एक काम बहुत सरल हो जाता है| केजीपी में मुझे हमारे वर्तमान डायरेक्टर प्रोफ. चक्रबर्ती का कार्यकाल पसंद आया। वे छात्रों से बातचीत करते हैं और केजीपी के लिए बहुत कुछ करते हैं। उन्होंने केजीपी की रैंकिंग बेहतर करने के लिए और छात्रों के लाभ के लिए काफ़ी कार्य किये हैं। मुझे आजकल लगता है कि लोग केवल अपने काम से काम रखते हैं। इसलिए शायद लोगों के बीच बातचीत कम हो गयी है। मैं सबको यह कहना चाहूँगा कि सबको जी भरकर जीना चाहिए। जितनी आज़ादी और जितने अवसर तुम्हें यहाँ पर मिलते हैं, वे तुम्हें किसी और कॉलेज में शायद ही मिलेंगे। मैं यह भी कहूँगा कि तुम जितने लोगों से बात कर सकते हो और अपने सम्बन्ध बना सकते हो, बनाओ क्योंकि ये लोग देश की सर्वश्रेष्ठ जनता हैं। ये पांच साल तुम्हें तुम्हारे शौक को ढूंढने के लिए हैं और तुम्हें अपनी ज़िन्दगी को यहीं पर सवार लेना है।

Manoj Meena

|| Electrical Engineering ||

|| Patel Hall ||

केजीपी आपको अनेकों मौके देता है, किसी एक चीज़ में मखाने पर दस चीज़ों में मचाने के - वो सुनहरे मौके जो अगर भुना लिए गए तो आपकी ज़िन्दगी बन जाती है, नहीं तो आप खुद भुन कर रह जाते हैं। केजीपी के सफर को सुहाना कहना अतिश्योक्ति तो हर्गिज़ नहीं होगी। यहाँ पर दोस्तों के साथ ख़ुशी में हँसे हैं तो लोड होने के समय साथ में एक दूसरे के आंसू भी पोंछे हैं। स्प्रिंगफेस्ट में साथ नाचे हैं तो बीमार होने पर साइकिल पर बी.सी. रॉय में रातें भी जागकर काटी हैं। हॉल के जीतने पर टेम्पो शाउट भी दिया है तो हारने के समय आँखें भी नम की हैं। पेपर्स के समय साथ में नाईट आउट्स करके पढ़ाई की है तो खाली समय में छेदिस और भास्की में चाय पर घंटों चर्चा भी की है। साथ में OP में सीनियर्स से गालियाँ भी सुनीं हैं तो फिर विंग में जाकर उनका खूब मज़ाक भी उड़ाया है। केजीपी में जब कदम रखा था तो लगा था कि कहाँ गाँव में आ गए हैं। आज इसी गाँव में जब अपना संसार बना लिया है तब ही इसे छोड़कर जाना पड़ रहा है। इन चार सालों में ज़्यादा पढ़ाई तो की नहीं पर इस सफर में चार चाँद लगाने का पूरा श्रेय आवाज़ और SWG को जाता है। SWG में रहकर पहली बार कैंपस टूर करवाना एक सही अहसास दिलाता है। आवाज़ में रहकर पासपोर्ट वेरिफिकेशन में घूसखोरी बंद करवाना हो या चुनावी समय में उम्मीदवारों के पसीने छुड़वाना और SOAPBOX में पूछे प्रश्नो पर तालियाँ सुनना - सब एक अजीब सा सुकून देती है। यह सुनने में भले थोड़ा ज़्यादा ही लगे, पर मेरे लिए मेरा केजीपी आवाज़ के बिना पूरा नहीं हो सकता। जाते जाते कुछ पंक्तियों में जूनियर्स के नाम सन्देश देना चाहूँगा ज़िन्दगी में सपने देखो, पर सोते हुए मत रह जाओ। कमरे से बाहर निकल कर उन्हें पूरा करो। हो सकता है कि सब पूरे नहीं हों, पर जो उस सफर में सीखोगे, वह पूरी ज़िन्दगी में हर मुश्किल से लड़ना सिखाएगा। ज़िन्दगी कुछ इस तरह जियो कि जब मौत आए तो वह भी कहे "वाह, क्या जीये हो"

Neha Aggarwal

|| Electrical Engineering ||

|| SN/IG Hall ||

यादें तो बहुत सारी हैं। जब मैं पहली बार यहाँ आयी थी, यहाँ आकर लगा था कि बहुत सही जगह आयी हूँ। मैं पहले साल के दौरान प्रवाह में बहुत सक्रिय थी। हर वर्ष स्प्रिंगफेस्ट के समय आवाज़ का एक कार्यक्रम होता हैं - पंच परमेश्वर। हम उसमें हर साल भाग लेते थे और जीतते भी थे। पहले साल से लेकर आखिरी साल तक, हर बार हम जीतते आए हैं। दूसरे साल ने मुझे बहुत सारे अविस्मरणीय पल दिए हैं। उस साल के दौरान मैंने पहली बार अंतर छात्रावास हिन्दी वक्तृत्व स्पर्धा में हिस्सा लिया था और बहुत अनपेक्षित रूप से मैंने स्वर्ण पदक हासिल किया। मुझे नहीं पता था कि यह एक बहुत बड़ी बात है, पर लोगों से प्रशंसा मिलने पर मुझे इसका महत्त्व ज्ञात हुआ। इसके अलावा मैं जिमखाना की फाइन आर्ट्स सेक्रेटरी थी। तीसरे साल में एक बहुत प्यारा पल था - मेरा जन्मदिन। उस दिन मेरे लिए पटाखे फोड़े गए थे। उस दिन मुझे शाही घराने के सदस्य होने जैसी अनुभूति हुई। अंत में, आख़िरी साल की बात करूँ तो कह सकती हूँ कि यह साल बहुत ही यादगार रहा है। इस साल का एक बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा होता है - प्लेस्मेंट्स। इस समय के दौरान अनजान लोग भी आपके बहुत अच्छे दोस्त बन जाते हैं। उस समय तो बस रोना भी साथ में और हँसना भी साथ में। इस साल इंटर हॉल नाटक में कांस्य पदक जीतने वाली टीम का मैं हिस्सा थी। अभी इस जगह से जो लगाव है उसका हर वक्त एहसास होता है। मेरा हमेशा से यही मानना रहा है कि जहाँ ज़िन्दगी ले चले, वहीं चलते रहो। इस धारणा की वजह से मेरी ज़िन्दगी में कोई ख़ास खेद नहीं रहे हैं। यहाँ की ज़िन्दगी साधारण और आरामपसंद है। यहाँ आज़ादी बहुत है। यह सब छोड़कर बाहर जाना थोड़ा डरावना लगता है। ऐसी ज़िन्दगी और कहीं नहीं मिल सकती है। इन चार सालों में लोग बहुत बदल जाते हैं, एक बेहतर तौर पर सबका व्यक्तित्व बदल जाता है। इस जगह की बहुत याद आएगी। बाहर जाकर बहुत कुछ बदल जाएगा। ऐसे दोस्त, ऐसी शांति, ऐसे नज़ारे, हमें कहीं नहीं मिलेंगे। यहाँ की एक-एक बात बहुत याद आएगी।

Nikhil Garg

|| ||

|| LLR Hall ||

मेरे फर्स्ट ईयर का अधिकतर समय दोस्तों के साथ मौज मस्ती में ही गुज़रा। सेकंड ईयर में मैं स्प्रिन्ग्फेस्ट के डिज़ाइन टीम का हिस्सा बना। मै हॉल की तरफ से फुटबॉल भी खेलता था तथा साहित्यिक टीम का भी हिस्सा था। केस स्टडी में भी मैंने अपना हाथ आजमाया। इस तरह सेकंड ईयर मेरे लिए काफी विविधताओं से भरा हुआ था। इस दौरान विभिन्न प्रकार के लोगों से भी मुलाक़ात हुयी जिनसे मैंने काफी कुछ सीखा। थर्ड ईयर में आने के बाद हॉल की गतिविधियों में थोड़ा कम शामिल हुआ। फोर्थ ईयर में मै प्लेस कॉम का सदस्य बना और उसका अनुभव बहुत ही फलदायक था। वह साल मेरे लिए काफी व्यस्त था लेकिन उसने मुझे काफी कुछ सिखाया। मैंने समय प्रबंधन सीखा। अंतिम वर्ष मेरे लिए कम दबाव भरा रहा क्योंकि जहाँ से मैंने इंटर्नशिप की थी वहीँ से मुझे PPO मिल गयी थी। मैंने उस वक़्त अपने दोस्तों की मदद की। केजीपी ने मुझे अलग अलग तरह के लोगों से घुलना मिलना, उनसे दोस्ती करना, रिश्तों को संभालना सिखाया। यहाँ से मिले दोस्त मुझे ज़िन्दगी भर याद रहेंगे। सीनियर्स ने हर तरह से मेरी मदद की है, इंटर्न के लिए फाइट मारने में, CV बनाने में, पढाई लिखाई में। उन्होंने मुझे मार्केट की स्थिति समझने में मदद की, माइनर का चुनाव करने में मदद की तथा हर मोड़ पर रास्ता दिखाया। जूनियर्स को सलाह देना चाहूँगा कि एक दो साल में सब चीज़ें आज़मा लो ताकि जब थर्ड ईयर में जाओ तो तुम्हें पता हो कि तुम्हारी रूचि किसमें है और तुम वही चीज़ करो। ग्रेड लाने से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है किसी चीज़ को प्रैक्टिकल रूप में बेहतर ढंग से करना सीखो। अंत में यही कहना चाहूँगा कि केजीपी ने काफी स्वतंत्रता दी, आत्मनिर्भर बनाया, कुछ वक़्त पर यह कठोर शिक्षक भी बना लेकिन मैं इसका हमेशा आभारी रहूँगा।

Nishant Kumar

|| Metallurgical and Materials science Engineering ||

|| Azad Hall ||

यहाँ आकर तो मेरे मन में यही शिकायत थी कि इस गाँव के बीच में मैं कैसे रहूँगा, लेकिन इसी ने मुझे मेरे साथियों के साथ कॉलेज में अधिक वक्त गुज़ारने का बहाना दे दिया और किसे पता था कि ये दोस्त ही मेरे लिए एक दिन कुछ ऐसा करेंगे कि मेरे लिए दोस्ती के मायने ही बदल जाएँगे। फर्स्ट ईयर (LBS Hall) में मुझे स्केचिंग, कार्टूनिंग में हिस्सा लेने का मौका मिला तो दूसरी ओर रंगोली में मुझे केवल कुछ ही दोस्तों के साथ जी-तोड़ मेहनत भी करनी पड़ी। क्षितिज में पहले वर्ष स्वयंसेवक के तौर पर जुड़ा, उसके बाद CTM बना। हमारा ग्रुप जिस शहर में प्रचार-प्रसार के लिए गया था, वहाँ हमारा कार्य काफ़ी सफल रहा था। साथ ही मैं गोल्ड जीतने वाली कोरियोग्राफी टीम में भी शामिल था। इन सब के दौरान मैंने अपने डर और घबराहट पर काबू पाना सीखा। सैकेंड ईयर में सीनियर्स के व्यवहार से मैं परिपक़्व हुआ और हमेशा कुछ नया सीखते रहने की इच्छा भी जाग्रत हुई। मैं चाहे फर्स्ट ईयर में LBS हॉल की बात करूँ या आज़ाद हॉल की, मेरे दोस्तों व सीनियर्स ने मुझे न केवल अलग-अलग गतिविधियों में भाग लेने को प्रोत्साहित किया बल्कि मेरे जीवन की कठिन परिस्थितियों में हर बार मुझे यथासंभव मार्गदर्शन भी दिया है। थर्ड ईयर में मुझे अपनी इंटर्नशिप को लेकर काफ़ी संघर्ष करना पड़ रहा था और मैं कुछ हद तक परेशान भी हो चुका था। तब मेरे दोस्त मुझे अपने साथ ले गये और घंटों मेरे साथ बस बातें करते रहे ताकि मेरा मन हल्का हो जाए। अगले ही दिन मैं अपने लक्ष्य में सफल हो गया। यह घटना मुझे आज भी भावुक कर देती है। ऐसी ही मदद मुझे प्लेसमेंट के समय भी मिली अर्थात् दोस्तों के मामले में मैं बड़ा भाग्यशाली रहा हूँ। मैंने अपने हॉल के अलावा अपने विभाग (MT) में भी प्रोफ़ेसर्स को काफ़ी मित्रवत और मददगार पाया है, ज़रूरत केवल इतनी ही है कि हम अपनी परेशानियाँ उनसे साझा करें। मुझे कम कक्षाएँ जाने का मलाल तो रहेगा लेकिन मैं सभी से यह कहना चाहूँगा कि कोई भी छोटे से छोटा काम मिले तो उस पर अपना शत-प्रतिशत देकर काम करो और यहाँ आकर कभी भी जिंदगी को पूरा मत मानो, इसके आगे भी बहुत कुछ करना है।

P. Onishant

|| Exploration Geophysics ||

|| RK Hall ||

केजीपी की पाँच साल की जिंदगी ने मुझे सामाजिक होना सिखा दिया है और आज मैं अपने व्यक्तित्त्व में जो भी सकारात्मक बदलाव महसूस कर रहा हूँ, सब कुछ यहाँ के वातावरण के कारण हुआ है। मैं फर्स्ट ईयर से ही हॉल के कामों में उत्साह से भाग लेता था। खेलों में मैंने फुटबॉल और शतरंज को चुना। वहाँ के सीनियर्स हमेशा कुछ-न-कुछ सलाह दिया करते थे जो जीवन के किसी-न-किसी मोड़ पर काम जरूर आते रहे हैं और आगे भी आएंगे। हर क्षेत्र के बारे में सलाहें दी जाती थीं और मुझे उनके साथ समय बिताना अच्छा लगता था। मैं जब फोर्थ ईयर में इंटर्नशिप के लिए बैंगलोर गया था तो मुझे मेरे से तीन साल वरीय फुटबॉल टीम के साथी खिलाड़ी मिले और पुरानी यादें ताजा हो गयीं कि कैसे वे हमें फंडे दिया करते थे। कहने का मतलब यह कि हम यहाँ जो कुछ भी करते हैं, अपने यादों की झोली को उससे भरते जाते हैं और वही यादें हमें बाद में चलकर एक अभूतपूर्व अहसास दिलाती हैं। फर्स्ट ईयर की शुरुआत में डिपार्टमेंट बदलवाने का बहुत उत्साह सवार था, पर धीरे धीरे पढाई के मामले में बातें मखती गयीं। जूनियर्स को सुझाव देना चाहूँगा कि अपने उत्साह को इतनी आसानी से ठंडा न होने दें और निरंतर अपने उद्देश्य की ओर बढ़ने की जी-तोड़ कोशिश करें। दूसरे साल में मैंने हॉल की गतिविधियों में भाग लेना जारी रखा और उससे बहुत कुछ सीखने को मिला। इधर पढ़ाई-लिखाई के मामले में भी थोड़ी सी सजगता दिखाई और दूसरे साल के अंत में अपने डिपार्टमेंट के कोर क्षेत्र में ही इंटर्नशिप की ताकि मुझे पता चले कि मेरी रूचि कहाँ है। पहले दो सालों में मैं इ-सेल में था जिसमें मुझे एंटरप्रेन्योरशिप के बारे में बारीकी से जानने का अवसर मिला और इसके लिए मैं उस ग्रुप का आभारी हूँ। मैंने इंडस्ट्रियल क्षेत्र में भी इंटर्नशिप कर ली थी, अतएव मैंने सोचा कि इस बार रिसर्च के क्षेत्र में आगे बढ़ूँ ताकि खुद को ठीक तरह से समझ पाऊं और मैंने यूनिवर्सिटी ऑफ़ विएना में इंटर्नशिप की, जो मेरे लिए बहुत यादगार रही। जूनियर्स को यही सुझाव देना चाहूँगा कि वे भी इसी तरह अपनी रूचि को पहचानने की कोशिश करें। अब चूँकि मेरा लक्ष्य मुझे पूरी तरह पता था तो चौथे और पांचवें साल में मैंने उसी की तरफ खुद को अग्रसर रखा। हॉल की क्रियाकलापों में भी शामिल रहा और हॉल का स्पोर्ट्स एडवाइजर बना। सबसे यही कहना चाहूँगा कि अपना समय बर्बाद न करें। कुछ न कुछ करते रहें। अगर किसी समय पढ़ाई में मन नहीं लगे तो कुछ खेल लिया करें। यहाँ पर अगर अपने लैपटॉप्स में घुसे रहेंगे तो बाद में बहुत पछताएंगे क्योंकि यह जो समय है अपने दोस्तों से सीखने का, अपने सीनियर्स से सीखने का, बस यही समय है। इसके बाद फिर यह मौका दुबारा नहीं मिलेगा।

Poonam Gupta

|| Agriculture and Food Engineering ||

|| MT Hall ||

पहली बार जब मैंने पुरी गेट पर नज़र डाली थी तब मुझे मेरे केजीपी आने के फैसले से थोड़ी मायूसी हुई थी। पर जब मैंने इस कैंपस को जाना तो समझ आ गया कि मेरे लिए इससे बेहतरीन जगह कहीं हो ही नहीं सकती। यहाँ का हर कोना यहाँ रहने वालों के जहन में हमेशा के लिए घर कर लेता है, चाहें वो दुनिया के किसी भी कोने में क्यों न चले जाएँ। और यह बात पूरी तरह सच है कि "you may leave kgp, but kgp never leaves you"। यहाँ के प्रतिभाशाली और बुद्धिमान लोगों के बीच रहते ही मैंने जाना कि मैं किस काम में सबसे बेहतर हूँ, मुझमे इतना आत्मविश्वास आ गया कि आज एक स्टार्टअप की जिम्मेदारी उठा पाऊँ। इतने लोगों से भरे कैंपस में भी यहाँ हर जगह सुकून और एक अलग ही शांति देता है। मुझे तो अभी से ही वो रजिस्ट्रेशन, एन.एस.ओ.,भाट की याद आ रही है। छुट्टियों के बाद लोगों को बैग पकड़ कर आता देखना, घर की बातें करना, सब कुछ कितना अद्भुत लगता था। और शायद इन्हीं खास खूबियों के कारण हम खुद को गर्व से केजीपीयन्स कहते हैं, न कि आईआईटीयन्स। जितना बड़ा यह कैंपस है, यहाँ रहते हुए सबको उतने मौके मिलते हैं कुछ नया करने के लिए। जरूरत है उन्हें समझ कर आगे बढ़ने की। कुछ दिनों से हो रही आत्महत्याओं से मुझे बहुत दुःख हुआ है। इसलिए मेरी यहाँ सभी से गुज़ारिश है कि अगर मुमकिन हो तो ज्यादा लोगों से दोस्ती बनायें, इससे आप लोगों की तकलीफ समझ सकेंगे और हल भी निकाल पाएंगे। हमेशा अपने दिल की सुनें क्योंकि भेड़-चाल में दुर्घटना के काफी आसार होते हैं। इसलिए सही और अलग राह चुनना जरूरी है।

Praniti Agrawal

|| Economics ||

|| MT Hall ||

प्रणीति अग्रवाल इन पांच सालों में मैंने बहुत से उतार चढ़ाव देखे हैं। आज भी वो दिन मेरी यादों में ताज़ा है जब मैं पहली बार यहाँ आई थी। रुंआसी सी होकर माँ ने पापा से कहा था "मेरी बेटी को कहाँ छोड़ कर जा रहे हो, पांच साल तक कहीं बाहर नहीं जा पायेगी, पूरा जंगल है।" पर समय के साथ हम सब ने इसे मान लिया। केजीपी हमेशा से मेरे लिए बहुत खास रहा है क्यूंकि यहाँ रहकर मैंने बहुत कुछ सीखा, खासकर मेरे आस पास के लोगों से। यहाँ आने वाले ज्यादातर लोग आम माहौल में पले बढ़े होकर भी अपने सपनों के लिए जी जान लगा देते हैं, चाहे वह पढाई के क्षेत्र में हो या कोई और काम। यही बात हमेशा से मुझे प्रेरित करती आई है। यहाँ हर किसी के पास प्रतिभा है और उसके मुताबिक सबको भरपूर मौका भी मिलता है। शायद इसी कारण मेरा झुकाव खेल की ओर बढ़ा। स्कूल के दिनों से ही मैं बहुत सारे खेल खेलती थी, पर टेनिस से मुझे विशेष लगाव था। मैं खुद को बहुत भाग्यशाली मानती हूँ कि लगातार तीन साल तक मैंने इंटर आईआईटी स्पोर्ट्स मीट में केजीपी का प्रतिनिधित्व कर स्वर्ण जीता। साथ ही साथ लगातार चार साल तक मै इंटर हॉल टेबल टेनिस चैंपियन भी रही हूँ। कई बार चोटिल होकर भी मैं भरपूर उत्साह से खेल पाई क्यूंकि मेरे आस पास ऐसे लोग थे जिन्होंने हमेशा मुझे प्रोत्साहित किया है। मलाल सिर्फ इस बात का है कि पिछले साल चोटिल होने के कारन मैं दोनों खेलों में भाग नहीं ले पायी थी। मैं चाहती हूँ कि केजीपी जल्द ही इंटर आईआईटी स्पोर्ट्स जनरल चैंपियनशिप जीते। यह मुश्किल जरूर है पर नामुमकिन नहीं, अगर हर संभव कोशिश की जाए। जब विदेश में भी आपकी सराहना होती है तो आप गर्व महसूस करते हैं और इस बात का एहसास मुझे मेरे तीसरे वर्ष में पेरिस में इंटर्नशिप के दौरान हुआ। मुझे यहाँ की हर छोटी चीज़ हमेशा याद रहेगी। यहाँ के दोस्त, टेम्पो शाउट, चुनौतियां, सब कुछ। यहाँ से निकलकर बाहर की चुनौतियों के बारे में सोच कर ही डर लगता है। मैं आने वाली अगली पीढ़ी से यही कहना चाहती हूँ कि अपने समय का सही इस्तेमाल करें। पढ़ाई आपकी प्राथमिकता होनी चाहिए, पर साथ ही केजीपी में आपके लिए और भी बहुत कुछ है। हर दिन आपको नयी चीजें देखने और सीखने को मिलेंगी जो आप कभी सीखना चाहते थे।

Prasad Fadke

|| Aerospace Engineering ||

|| LLR Hall ||

उम्मीदों का एक खज़ाना लेकर आया था मैं इस नए घर पर, नादान फच्चा था मैं आईआईटी की टी-शर्ट पहन कर घूमता था, अपने फेसबुक और कोरा पर आईआईटीयन लिखता था। सोचा था यहाँ एयरोस्पेस में फाइटर प्लेन बनाऊंगा, अब्दुल कलाम न सही, आयरन मैन ही बन जाऊंगा; लेकिन मुझे क्या पता था कि यह जगह एक छात्र को इंजीनियर नहीं, बल्कि एक बच्चे को बंदा बनाती है। थर्मोडिनामिक्स या फ्लूइड मैकेनिक्स मैं भले न सीख पाया, परन्तु कोई नयी चीज़ सीखते या सिखाते कैसे हैं, ये जान गया। ग्रेड बढ़ाने के लिए प्रोफेसर्स को नहीं मना पाया, लेकिन एग्जाम की एक रात पहले पूरा कोर्स पढ़ा दे ऐसे दोस्त ज़रूर जीत पाया। वक़्त पर सोने और वक़्त पर जागने की वो अच्छी आदतें तो छूट गयीं, लेकिन साथ साथ वो कभी न वापस आने वाली रातो की वो यादें भी छोड़ गईं। न जाने कब नसीब होंगे 2.2 के वो भाट, न जाने कब वापस मिलेगा मेरे दोस्तों का साथ; आते वक़्त हमें बताया गया था कि ये स्कूल नहीं कॉलेज है, चार साल बाद मैं कहता हूँ कि ये कॉलेज नहीं स्कूल है, पर यहाँ पढ़ाई नहीं, ज़िंदगानी है।

Pratibha Verma

|| Architecture and Regional Planning ||

|| MT Hall ||

इन पांच वर्षों ने मेरे व्यक्तिगत और व्यावहारिक दोनो ही प्रारूप बदल दिए। मुझे एक संकोची लड़की से एक परिपक़्व और मज़बूत इंसान बनाया है। जब मैं प्रथम वर्ष में आयी थी, बाकियों की तरह मैं भी अति उत्साहित थी जैसे अमूमन सभी होते हैं। पर समय ने मुझे संयम रखना सीखा दिया। केजीपी की आबोहवा दिल को सुकून देने वाली है जो हमेशा मेरी यादों में ताज़ा रहेगी। यहाँ के नाईट आउट्स के तो क्या ही कहने ! यहाँ आकर मैंने आज़ादी के अलग स्तर को महसूस किया है, जैसी शायद ही मुझे कहीं और कभी मिल पायेगी। यूँ तो आर्किटेक्चर डिपार्टमेंट के होना का मतलब यही है कि सबमिशन की तलवार हमेशा गर्दन पर लटकती रहती है। पर रात-रात भर अपने दोस्तों के साथ काम करने का मजा ही कुछ और होता है। और जब आपकी मेहनत आपके सामने होती है तो जो ख़ुशी मिलती है, वो मैं बयां नहीं कर सकती। इस दौरान बहुत से पल ऐसे आएंगे जब लगेगा कि आपके हाथ से सब कुछ छूटता जा रहा है। ऐसे में जरुरत है शांत रहकर सही फैसले लेने की। फिर क्या? देखते ही देखते हर परेशानी बौनी लगने लगेगी। आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ तो मुझे समझ आता है कि केजीपी ने मुझे क्या दिया है। वे सब अब हमेशा मेरे साथ रहेंगे। यहां मैंने ऐसे दोस्त बनाये हैं जो हमेशा मेरे साथ मेरी ताकत खड़े रहे। ऐसे ऐसे प्रयोग किये जो मैं कहीं और नहीं कर सकती हूँ। ये पांच साल मेरी जिंदगी के अहम् पल रहे हैं।

Pratik Khedikar

|| Instrumentation Engineering ||

|| Patel Hall ||

मेरी यादों की किताब में केजीपी का एक खूबसूरत अध्याय है। मैंने इस सफ़र में वो नज़ारे देखे जिसमें मैं खुद को बेहतर बनाता हुआ सा लगता हूँ। अपने पटेल हॉल, अपनी ब्रांच और केजीपी से बहुत कुछ सीखा, समझा और इतने दोस्त बनाए कि ज़िंदगी में कभी ख़ालीपन आया तो इन सब से उसे भर दूँगा। मेरी प्रथम वर्ष की यादें शुरू हुईं प्रवाह से और वो दिन मेरी इस याद को और सुनहरा कर देता है जब मैंने पहली बार स्टेज पर खड़े होकर अपनी पहली प्रस्तुति दी थी। जब पटेल हॉल में गया तो काम करना और काम कैसे करवाते हैं, यह सीखा। मैं अपने द्वितीय वर्ष में हॉल का ड्रामेटिक्स सेक्रेटेरी था और तृतीय वर्ष में जनरल सेक्रेटेरी (सो-कल्ट) था। इस दौरान मैंने समय का सदुपयोग करना सीखा और अगर मैं दिन में बारह-तेरह घंटे काम न करूँ तो दिन अधूरा सा लगता था। इन चार सालों से मैं पटेल में पोहा खाते हुए दोस्तों के साथ बिताए हुए पल, इल्लुमिनेशन में जलाए दियों की रौशनी और वो हर लम्हा जिनका मैं भागीदार था, साथ ले जा रहा हूँ। यहाँ की जनता को मैं बस इतना कहना चाहूँगा कि बहुत काम करो, बहुत कुछ सीखो, कुछ न कुछ करते रहो। उदाहरण के लिए कहूँ कि बिश्वपति सरकार ने कहा था कि तुम गड्ढा ही क्यों न खोदो, पर याद रखो कि इससे बॉडी और दिमाग़ मोमेंटम में रहेगा और बस यही तो चाहिए ज़िंदगी जीने के लिए।

Pratiksha Patil

|| Industrial and System Engineering ||

|| MT Hall ||

पांच साल पहले वाली प्रतीक्षा और आज की प्रतीक्षा में जो इतना अंतर है, उसका सारा श्रेय जाता है केजीपी और यहाँ के लोगों को। पहले से बिलकुल अलग आज मैं एक आत्मविश्वासी और खुले सोच वाली लड़की हूँ। यह जगह है ही ऐसी कि सबको बदल दे। खड़गपुर हमेशा से मेरे लिए बहुत ही खास रहा है। यहाँ का हर एक कोना बहुत सुन्दर और शांत है। जितनी स्वतंत्र और सुरक्षित यहाँ खुद को मैं महसूस करती हूँ, वैसा शायद कहीं और न कर पाऊँ। दोस्तों के साथ रात भर सड़कों पर ऐसी मटरगश्ती करने का मौका कहीं नहीं मिलेगा। शरुआती दिनों में मुझे लेक साइड पर बैठना बहुत अच्छा लगता था। खैर वो जगह अब इतनी साफ़ नहीं रही। केजीपी में आपके खाने की इच्छा पूरी करने के बेहतरीन इंतज़ाम हैं। अरेबियन नाइट्स की गार्लिक ब्रेड और शोरमा का नाम सुनते ही मुँह में पानी आ जाता है। यहाँ रहकर ही मैंने हर तरह की पागलपंती की है। बस एक इच्छा अधूरी रह गयी, इंस्टी टॉप पर जाने की। पहले साल में मैंने पढ़ाई को बहुत हल्के में लिया और अपना ज्यादातर समय मस्ती में निकाल दिया। पर जो समय हाथ से निकल गया उसका एहसास मुझे तब हुआ जब तीसरे साल में मुझे यह मालूम हुआ कि सीजी प्लेसमेंट को कितना प्रभावित करती है। उस नाज़ुक समय में मुझे सब कुछ छोड़ कर अपना पूरा समय पढ़ाई को देना पड़ा। इसलिए सभी को मेरी यही सलाह है कि शुरुआत से पढ़ाई पर बराबर ध्यान दें ताकि आगे चलकर आपको अपने दिलचस्पियों से समझौता न करना पड़े। क्षितिज का हिस्सा होना मेरे लिए बहुत खास रहा। यहाँ रहकर मैंने बहुत कुछ सीखा। केजीपी से जुड़ी हर चीज़ ने मुझे एक अलग अनुभव दिया है जो मैं कभी नहीं भूल पाऊँगी।

Priyanka Jayaswal

|| Mathematics and Computing ||

|| MT Hall ||

पांच साल बीत गए ! बस कुछ वक़्त और, फिर हम एलम कहलाए जायेंगे। यह समय मेरे जीवन का महत्वपूर्ण पहलू रहा है। जब प्रथम वर्ष में मैं यहाँ आई थी, मैं दिशाहीन थी,अपने जुनून को नहीं जान पायी थी। आगे क्या करना है, कैसे करना है, कुछ भी मालूम नहीं था। धीरे -धीरे मैं समय के साथ ढ़लती गयी और परिस्थितियाँ समझ आने लगी। यहाँ रहकर ही मेरी मुलाकात उन खास लोगों से हुई जिन्होंने हमेशा मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया, जिनसे मैं प्रेरणा लेती आई हूँ। मदर टेरेसा हॉल की हॉल प्रेसिडेंट होने का अलग ही रोमांच रहा। पहली बार हमने चुनाव में अपने उम्मीदवार खड़े किये थे और जब उसकी जीत हुई तो मुझे बहुत फक्र महसूस हुआ। वह मेरे और पूरे हॉल के लिए बहुत बड़ी बात थी। क्षितिज, डेप, हॉल - हर जगह से मेरा अलग जुड़ाव रहा और यहीं से कभी न भूल पाने वाली अनमोल यादें मिली। इन यादों में हर चीज़ है - मस्ती, तनाव, रोमांच, उत्सुकता और बहुत कुछ। कभी कभी ऐसा लगता था कि यहाँ आने का मेरा फैसला सही है या नहीं, मैं कुछ सीख पायी हूँ भी या नहीं। पर समय के साथ मेरी यह उलझन भी सुलझ गयी। आज मेरा जीवन अब एक अनसुलझी पहेली से बदल कर एक व्यवस्थित सी तस्वीर की तरह हो गयी है। मैं आने वाली पीढ़ी को यही सलाह देना चाहूँगी कि अगर मन में कुछ सीखने की चाह हो तो आपको सी.वी. बनाने की मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी। आपकी कोशिश आपकी सी.वी. से झलकेगी। लेकिन अगर आप केवल सी.वी. बनाने का बोझ लेकर चलेंगे तो चीजें कठिन हो सकती हैं। नयी चीज़ें सीखते रहें, प्रयोग करते रहें और आगे कदम बढ़ाते रहें। कहते हैं कि परिवर्तन ही सृष्टि का नियम है और यह बात आपको आगे चलकर माननी ही पड़ेगी। इसलिए हर बदलाव को सहजता से अपनाएँ। ये पल दोबारा कभी वापस नहीं आएँगे। बस हमारी यादों में रह जायेंगे।

Ramesh Thakur

|| Chemical Engineering ||

|| Azad Hall ||

मेरे लिए तो केजीपी जैसी जगह पर रहना लीक से बिल्कुल हटकर अनुभव था। मैं ग्रामीण पृष्ठभूमि से हूँ, अतः जब यहाँ आया तो यह देखकर पूरी तरह हैरान था कि आईआईटी में विद्यार्थी पढ़ने के साथ साथ इतनी सारी अलग-अलग गतिविधियाँ भी करते हैं। मैं तो यही सोच कर आया था कि यहाँ अच्छे प्रोफेसर मिलेंगे और हम सब इंजीनियर बनकर निकलेंगे, लेकिन फिर नॉन कोर क्षेत्र को जानने और सीखने का भी मौका मिला। पहली कक्षा में भी काफ़ी चौंका देने वाला अनुभव रहा, प्रोफेसर ने देखते ही देखते स्लाइड ऐसे घुमाई कि सब कुछ मेरी समझ से परे ही रहा। केजीपी के जीवन की बात करें तो फर्स्ट ईयर में एम.एम.एम हॉल में जीवन काफ़ी नीरस था लेकिन आज़ाद हॉल में आकर यह कमी दूर हो गयी। मेरे अंदर काफ़ी बदलावों की शुरुआत हुई। मैं ‘आवाज़’ का हिस्सा बना और यहाँ मैंने प्रबंधन से लेकर नेतृत्व जैसे कौशल का विकास किया। केवल इतना ही नहीं, मुझे दोस्तों और सीनियर्स का ऐसा माहौल भी मिला जिसमें मैं बाकी जगहों की तुलना में अधिक सहज और प्रसन्नचित महसूस करता था। इसके अलावा मुझे जो केजीपी में याद आएगा, वह है मेरे दोस्तों का साथ। मुझे याद है कि किस तरह मैं द्वितीय वर्ष में सेमेस्टर की शुरुआत से काफ़ी लंबे समय तक बी.सी. रॉय अस्पताल में रहा था और मैंने अपना मिड सेम का पूरा इम्तिहान अपने दोस्तों की मदद से दिया था। वे अपनी पढ़ाई के साथ मुझे वहीं पर तैयारी करवाते थे। इससे मैं जीवन की अप्रत्याशित घटनाओं को झेलने की क्षमता भी हासिल कर पाया। इसी तरह इंटर्नशिप के समय भी मेरे सीनियर्स और दोस्तों ने मेरा भरपूर सहयोग किया। इसलिए मैं यही कहना चाहूँगा कि केजीपी एक छोटी सी दुनिया है, यहाँ हर तरह की चीज़ें देखने को मिलती हैं और जो दोस्त तुम यहाँ बना लेते हो वो कब तुम्हारे परिवार बन जाते हैं, तुम्हें पता ही नहीं चलता। इसीलिए दोस्त बनाओ, ये दोस्त तुम्हें आगे चलकर न केवल याद आयेंगे बल्कि हमेशा तुम्हारी मदद के लिए तैयार भी रहेंगे।

Rameshwar Jaiswal

|| Mechanical Engineering ||

|| RP Hall ||

इतालवी कलाकार माइकल एंजेलो ने एक बार कहा था "हर पत्थर के अंदर एक मूरत है परन्तु उस पत्थर को आकार देना एक मूर्तिकार का काम है।" मेरी ज़िंदगी में भी केजीपी का किरदार उसी मूर्तिकार की तरह है, जो एक मामूली पत्थर को अपनी कला से बेशक़ीमती मूर्ति में बदल देता है। साल दर साल इस जगह ने मुझे गढ़ा है, मेरे व्यक्तित्व निर्माण में यहाँ की हर चीज़ का योगदान है। खुद को भाग्यशाली समझता हूँ कि केजीपी में पांच साल बिताने का मौका मिला। इन पांच सालों में ढ़ेर सारी यादें, कुछ बहुत अच्छे दोस्त मिले हैं जिनसे मैं हमेशा जुड़ा रहूँगा। कहते हैं एक केजीपीयन की पहचान का एक अहम् हिस्सा होता है उसका हॉल। मैं फर्स्ट ईयर से ही R.P. में था तो इल्लू और रंगोली से जुड़ना स्वाभाविक ही था। पहली बार जब केजीपी की इस सबसे अनूठी संस्कृति से रूबरू हुआ तो दंग रह गया था। फिर धीरे-धीरे एहसास हुआ की केजीपी का हर पहलू एक सुखद आश्चर्य के साथ उद्घाटित होता है। केजीपी को और ज्यादा समझने और खुद को अपडेट रखने में आवाज़ मेरे लिए एक सहज जरिया रहा। आवाज़ से मैं अपने सेकेंड ईयर में जुड़ा। मुझे केजीपी के सबसे अच्छे दोस्त, सबसे अच्छे सीनियर्स और कुछ होनहार जूनियर्स आवाज़ में ही मिले। कुल मिलाकर कहें तो केजीपी में बिताया हुआ हर लम्हा कुछ न कुछ ख़ास देकर गया। आज जब पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो खुद को कल से बेहतर पाता हूँ। कैसे ये उतार-चढ़ाव वाले पांच सालों का सफ़र बीत गया, पता ही नहीं चला। दुःख भी होता है यह जानकर कि इसी उतार-चढ़ाव में कुछ लोग हार मान बैठे। इस जगह में असीमित जीवंतता होने के बावजूद बार-बार जब ऐसी खबरें आयीं तो मन में कई सवाल उठने लगे। मुझे लगता है केजीपी के हर बाशिंदे के अंदर इतनी क्षमता है कि वह ऐसे उतार चढ़ाव को आसानी से झेल सकता है। और यही तो केजीपी सिखाता है हमें, तूफ़ानों में नैय्या पार कैसे कराते हैं, कैसे हर मौके को भुनाते हैं और कैसे हर अवसर को अपने हित में तब्दील करते हैं। मैं भी यहाँ से यही जज्बा और यही सीख लेकर जा रहा हूँ। केजीपी से अलविदा लेते लेते मैं जूनियर्स को एक ही हिदायत देना चाहता हूँ कि चाहे कुछ भी हो जाये "Never Quit!"। जीते रहो दिल खोल के, लड़ते रहो ईमानदारी से और खुद को किसी से कम मत समझो, फिर देखना तुम्हे सफलता मिलने से कोई नहीं रोक पायेगा।

Ravi Ranjan

|| Mining Engineering ||

|| RK Hall ||

केजीपी में आने के बाद हम अपने आप को एक नयी परिभाषा देते हैं और एक नयी सोच लेकर जाते हैं। केजीपी का सफर अत्यंत रोमांचक रहा। पाँच साल के अंत में मुझे यह एहसास होता है कि इतने समय में एक व्यक्ति का दृष्टिकोण बदल जाता है और वे अपने आप को खोज लेते हैं। मेरा फर्स्ट ईयर यही मानने में निकल गया कि अब जेईई का लक्ष्य प्राप्त हो गया और अब कुछ और आगे बढ़ना है। मैं फर्स्ट ईयर में MMM में था। यहाँ पर मुझे नए लोग मिले और उस समय मुझमें बिलकुल अलग ही उत्साह रहता था। फर्स्ट ईयर में मुझे अलग-अलग कैंटीन के पते लगाना और वहाँ खाना बहुत पसंद था। सेकंड ईयर एक अलग ही अनुभव होता है। मेरे लिए मेरा सेकंड ईयर ही सबसे अच्छा रहा। मेरे हिसाब से यहीं से असली केजीपी और हॉल की जिंदगी शुरू होती है। सेकंड ईयर में मुझे RK हॉल मिला। मैंने इल्लू भी देखा और GC का असली मज़ा भी लिया। मुझे फिल्म निर्माण में बहुत रुचि थी, इसलिए मैं TFPS का हिस्सा बना। मैंने हॉल के लिए एड डिज़ाइन में और केस स्टडी में हिस्सा लिया। मैंने खेल में क्रिकेट में भाग लिया। सामजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी मैं म्यूजिक देता था। थर्ड और फोर्थ ईयर में लोग सही में अकादमिक रूप से समृद्ध होते हैं और सोचते है कि उन्हें आगे जाकर क्या करना है। मुझे फोर्थ ईयर में समझ आने लगी थी कि मुझे आगे क्या करना है। मुझे यह भी लगता है कि लोगों को प्लेसमेंट्स को तनाव से नहीं लेना चाहिए बल्कि प्लेसमेंट में उत्साह से आगे बढ़ना चाहिए। मुझे लगता है कि फिफ्थ ईयर वाले छात्र वापस फर्स्ट ईयर वालों की तरह बन जाते हैं। हमारे पास करने को ज़्यादा कुछ नहीं होता और हमें एक तनावहीन जीवन जीने को मिलता है। फर्स्ट से फिफ्थ ईयर तक हम पूरा चक्र घूमकर वहीं आ जाते हैं। जैसे फर्स्ट ईयर वालों के लिए ज़िन्दगी का एक नया पहलू शुरू होता है, वैसे ही हमारे लिए भी कुछ महीनों में एक नया पहलु शुरू होगा। मुझे RK के बारे में यह बहुत पसंद है कि यहाँ थर्ड, फोर्थ और फिफ्थ इयर्स एक ही विंग में रहते हैं। यह बहुत अच्छा लगता है क्योंकि इससे सीनियर और जूनियर के बीच बातचीत बनी रहती है। अभी भी लोग मेरे कमरे में आकर भाट मारते हैं और मैं भी किसी के भी कमरे में जाकर भाट मार सकता हूँ। मैं जब सेकंड ईयर में था तब मैं फोर्थ ईयर के कमरे में भी वैसे ही बातें करने चला जाता था। पर अब जब भी जूनियर्स मुझसे मिलने आते हैं तो काम से ही आते हैं। इस तरह का बदलाव मुझे अच्छा नहीं लग रहा। केजीपी में हमारी सोच प्रक्रिया पर कोई बाधा नहीं होती और हम अपने आसपास के लोगो को देखकर भी बहुत कुछ सीखते हैं। केजीपी में एक व्यक्ति में प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता आ जाती है। यह सबसे बड़ा बदलाव है जो मैं अपने आप में देखता हूँ। मुझे लगता है कि आजकल फर्स्ट और सेकंड ईयर के छात्र बहुत ज़्यादा भविष्योन्मुख हैं जो मेरे समय पर देखने को नहीं मिलता था। यह अच्छा भी है लेकिन इसकी वजह से वे अपने वर्तमान को अच्छे से नहीं जी पाते। मेरे हिसाब से उन्हें वर्तमान और भविष्य के बीच अच्छा संतुलन बनाना चाहिए।

Richa Bhushan

|| Chemical Engineering ||

|| SN/IG Hall ||

जब मैं खड़गपुर आयी थी, तब मुझे यहाँ की सबसे अच्छी बात जो लगी वह यह थी कि यहाँ मुझे हर तरह के लोग मिले थे। दोस्तों से बातें करते और सीखते हुए धीरे-धीरे मैंने देश के विभिन्न संस्कृतियों को समझा। सच ही है कि आपके दोस्त और आपके आसपास का वातावरण आपको काफी कुछ सिखा जाते हैं। केजीपी के सफर के पाँच सुनहरे सालों में मैंने काफी अच्छे दोस्त बनाये जिनकी दोस्ती और प्यार मेरे साथ आजीवन रहने वाली है और वे लोग तो अब जीवन का अटूट हिस्सा बन चुके हैं। खड़गपुर की सबसे पहली चीज़ जो मैं कभी नहीं भूलूंगी वो थी - 'खोज' में जीतना, जिसमे मैंने पहली बार अपने दोस्तों के साथ किसी प्रतियोगिता में भाग लिया था। मज़े की बात तो यह है कि साइकिल चलाना भी मैंने यहीं आकर सीखा। ऐसा लग रहा है कि केजीपी में गिरते हुए संभलने की शुरुआत उस पल से ही हो गई थी। यहाँ से जाने के बाद मैं अपने दोस्तों को मिस करुँगी, यहाँ की स्वतंत्रता को मिस करुँगी, स्प्रिंगफेस्ट और क्षितिज को मिस करुँगी और यहाँ तक कि मैं साइकिल चलाना भी बहुत मिस करने वाली हूँ। पर सबसे ज़्यादा मैं एस अल्हड़पन और उत्तरदायित्व से मिले जुले इवेंट्स को समझती ऋचा को मिस करुँगी। फर्स्ट ईयर में मैंने इ-सेल में GES इंटर्न के तौर पर काम करना शुरू किया और फिर सेकेंड ईयर से मैं टी.टी.जी. के साथ जुड़ गयी। सोसाइटीज में काम करने से मुझे काफी अनुभव मिला। फिर अपने सेकंड ईयर में मैंने कोडिंग करने की कोशिश की, लिखने की भी कोशिश की और अपने डिपार्टमेंट के विषयों पर पूरा ध्यान लगाया। उस दौरान मुझे पता नहीं था कि मेरी रूचि किस क्षेत्र में है। इसलिए मैंने अपना सेकेंड ईयर केवल चीज़ों को जानने, समझने और नए-नए अवसरों को एक्स्प्लोर करने में बिताया और मैं अपने जूनियर्स को भी यही सलाह देना चाहूँगी कि अपने फर्स्ट और सेकेंड ईयर को यूँ ही व्यर्थ न जाने दें। उस महत्वपूर्ण समय का भरपूर इस्तेमाल नई चीज़ों को सीखने और एक्स्प्लोर करने में करें। इस दौरान मेरी एक रिसर्च पेपर भी आयी थी। इस रिसर्च की वजह से मुझे बाद में इंस्टिट्यूट की ओर से एक नेशनल और एक जर्मनी में आयोजित अंतराष्ट्रीय सम्मलेन में जाने का अवसर मिला। थर्ड ईयर की मेरी केमिकल की कोर कंपनी की इंटर्न ने मेरे करियर को दिशा दी। फोर्थ ईयर में मैंने बहुत सारी प्रतियोगिताओं में भाग लिया, जिस दौरान मुझे काफी कुछ सीखने को मिला। इन महत्वपूर्ण अनुभवों की वज़ह से ही मेरी फोर्थ ईयर में शेल में इंटर्न लगी और फिर पीपीओ भी मिला। अगर कोई मुझसे अपनी केजीपी लाइफ को एक लाइन में स्पष्ट करने के लिए कहे तो मैं बस यह कहूँगी कि 0 से 100 तक की दौड़ के लिए केजीपी कई अवसर बार-बार देती है, आप बस इस सफर को एक्स्प्लोर करें और इसका भरपूर आनंद लें।

Riya Bubna

|| Computer Science and Engineering ||

|| SN/IG Hall ||

हम जहाँ भी जाते हैं हमें वहाँ से कुछ न कुछ सीखने को मिलता है। हर एक अनुभव अपने आप में अलग होता है, चाहे वह स्कूल हो या कोचिंग। पर जो अनुभव मुझे खड़गपुर में बिताये चार सालों ने दिया है, वह शायद ही कहीं और मिल पाए। पहले साल के बारे मे बोला जाए तो शुरुआत में सब कुछ Encore से ही जुड़ा था। पर रोबोटिक्स के फेस्ट के बाद रोबोटिक्स से बहुत लगाव हो गया। रोबाटिक्स मेरे इन चार सालों के सफ़र का बहुत अविस्मरणीय भाग रहेगा। वो हर शाम क्लास के बाद दोस्तों के साथ घूमना, दिन भर की बातें करना, मानो रूटीन सा बन गया था। साइकिल से वो 2.2 का चक्कर ही काफी होता था दिन भर की थकान मिटाने के लिए। उस पर मेरे पसंदीदा VS कैंटीन का खाना रही सही कसर पूरी कर देता था। और देखते ही देखते पहला साल निकल गया। मेरे तीसरे साल के दौरान मैं हार्डवेयर मॉडेलिंग से जुड़ी थी। और इसी साल मुझे हॉल की ओपन सॉफ्ट की कप्तानी की जिम्मेदारी भी मिली। यहाँ रहते हुए मेरे मन में कई बार यह सवाल आया कि इतनी छोटी सी जगह में रहते हुए इंसान को इतने सारे अनुभव कैसे मिल सकते हैं। कैसे चार साल बीत गए, पता ही नहीं चला। और जब सब कुछ छोड़ कर जाने का दिन पास आने लगा तो मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था। मैं इस जगह को छोड़ कर जाने के बारे में सोच भी नहीं पा रही थी। केजीपी में बिताये ये चार साल मेरे लिए बहुत ख़ास रहे हैं और मैं इसे कभी नहीं भुला पाऊँगी।

Ruchita Kachhap

|| Electrical Engineering ||

|| SN/IG Hall ||

जब मैं फर्स्ट ईयर में केजीपी आई थी तब मैं बहुत ही विस्तृत सोच के साथ आई थी। केजीपी का मेरे विचारों को दिशा देने में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। ऐसा एक भी दिन नहीं रहा है जिस दिन मेरे पास करने के लिए कुछ न हो क्योंकि यहाँ सभी को अवसर मिलता है। मैं फर्स्ट ईयर में रोबोटिक्स, प्रवाह और डिबेटिंग सोसाइटी की मेंबर थी। इन सब का हिस्सा बनकर मैंने अपने अंदर काफी कौशल विकसित किए। अकेले काम करना बहुत आसान होता है लेकिन सभी को साथ के कर चलना आसान नहीं होता। ये सब कुछ मैंने रोबोटिक्स में सीखा। मुझे अलग-अलग चीज़ों में भाग लेने में बहुत मज़ा आता था। जैसे कि हार्डवेयर मॉडलिंग में मुझे बहुत रूचि थी। मेरी हमेशा से ही कोशिश रही है कि ज़्यादा से ज़्यादा लड़कियाँ ऐसे वर्कशॉप्स में हिस्सा लें। केजीपी में एक दिशा सीमा स्कूल सेंटर था जो केजीपी के एलम ने ही शुरू किया था। अपने चौथे वर्ष में मैं वहाँ कुछ दिन छोटे-छोटे बच्चों को पढ़ाने गई थी। वह मेरे लिए बहुत मज़ेदार अनुभव था। इन पॉँच सालों में केजीपी में भी बहुत सारे परिवर्तन आए हैं और उसके साथ साथ मुझमे भी। मैं VS के तीखे, मसालेदार खाने को बहुत मिस करती हूँ। और अच्छी बात यह हुई कि जब मैं थर्ड ईयर में थी तब बस चलनी शुरू हुई थी। अंत में मैं बस इतना कहना चाहती हूँ कि केजीपी में एक्स्प्लोर करने के लिए बहुत कुछ है और अगर हम इस अवसर का उपयोग करें तो हम एक सफल इंसान बन सकते हैं। इसलिए यहाँ मिलने वाले हर मौके का भरपूर फ़ायदा उठायें क्योंकि यह सब दोबारा कहीं और नहीं मिलने वाला।

Sandeep Siram

|| Mechanical Engineering ||

|| Azad Hall ||

अगर अभी भी मुझसे पूछा जाए तो मैं यही कहूँगा कि मुझे यकीन नहीं होता कि मैं यहाँ से जा रहा हूँ। केजीपी में सबसे ज़्यादा मुझे जो याद आएगा वो हैं मेरे दोस्त और सीनियर्स जिन्होंने मेरे व्यक्तित्व में सकारात्मक परिवर्तन लाने में अहम भूमिका निभाई। यहाँ आकर मुझे जिस विविधता के साथ लोगों से मिलने का अवसर मिला वह शायद ही कहीं किसी और संस्थान में मिल पाता। जब मैं फर्स्ट ईयर में था तो केवल पढ़ता रहता था, मुझे DepC जो करनी थी। मैंने माइनिंग इंजिनियरिंग से मेकैनिकल इंजिनियरिंग विभाग प्राप्त किया। लेकिन सैकेंड ईयर में मैंने आज़ाद हॉल में आकर ओ.पी. के ज़रिए सीनियर्स से परिचय बढ़ाया। सीनियर्स ने हमेशा हमें कुछ एक्स्ट्रा एकेडेमिक करने और अपनी रुचियों को पहचानने पर ज़ोर दिया। मैं स्प्रिंग फेस्ट से जुड़ा और तब मैंने अलग-अलग शहरों में जाकर लोगों से बातें करना, स्वयं को प्रस्तुत करना सीखा। मैंने अपने आप को अपने पहले साल की तुलना में पूरी तरह बदला हुआ महसूस किया, साथ ही नेतृत्व और निर्णय-क्षमता जैसे कुछ गुणों का विकास किया। थर्ड ईयर में मैंने स्पॉन्सरशिप के बड़े भाग का प्रबंध किया। मैं ऐसा इसलिए कर पाया क्योंकि यह काम मुझे दिल से पसंद था। मेरे सफल अनुभव के कारण मैं अगले वर्ष प्लेस कॉम का सदस्य बना। मैंने वहाँ भी समर्पण व ज़िम्मेदारी के साथ काम करने का पूरा प्रयत्न किया। उस वर्ष हम कुछ प्रतिष्ठित कंपनियों को पहली बार बुलाने में भी सफल हुए। इन सब के दौरान इतना व्यस्त रहने लगा कि मैं एकेडेमिक्स से तालमेल नहीं बैठा पाया, लेकिन जीवन में यह समझना चाहिए कि जब आप पर एक साथ कई लागों की ज़िम्मेदारियाँ हों तो त्याग भी ज़रूरी है। हालाँकि अभी भी मैं यही कहूँगा कि पढ़ाई को कभी हल्के में मत लें। अपनी परेशानियों को लेकर सीनियर्स से मिलो, फंडे लो। आपको जो हासिल करना है, उसे लेकर स्पष्ट दृष्टिकोण बनाओ। वे आपकी मदद ज़रूर करेंगे क्योंकि वो खुद ऐसे दौर से गुज़र चुके होते हैं। अंततः यही कहना चाहूँगा कि केजीपी में करने को इतना कुछ है कि हर कोई अपने लिए कुछ न कुछ पा लेता है, इसलिए सभी को किसी न किसी गतिविधि में भाग लेना चाहिए क्योंकि आप सभी यहाँ पढ़ कर आए हो और पढ़ते रहोगे। आप इसके अलावा जो कौशल यहाँ सीखोगे वही आपको बाकी लोगों से अलग बनाएगा।

Sanjay Yadav

|| Chemical Engineering ||

|| MS Hall ||

आईआईटी खड़गपुर में आने के बाद मुझे बहुत अच्छा लगा। हालाँकि मैं अपने फर्स्ट ईयर में ज्यादा कुछ कर नहीं पाया। सेकंड ईयर में मुझे एम.एस. छात्रावास मिला और फिर सीनियर्स से बातचीत हुई और केजीपी के बारे में बहुत कुछ पता चला। सेकंड ईयर से ही मैं क्रिकेट, एथेलेटिक्स, वॉलीबॉल, ड्रामेटिक्स, कोरिओग्राफी में भाग लेने लगा था परन्तु थर्ड ईयर में मैं उनमे से कुछ विशेष चीज़ें की चुनने लगा और मैंने अपना ध्यान क्रिकेट और एथलेटिक्स पर केंद्रित किया। दुर्भाग्यवश, पैर में चोट के कारण मैं इंटर आईआईटी की क्रिकेट टीम में अपनी जगह पक्की नहीं कर पाया परन्तु मेरे हॉल के प्रदर्शन के आधार पर मेरा इंटर आईआईटी की एथलेटिक्स टीम में चयन हुआ और मुझे आईआईटी खड़गपुर का प्रतिनिधित्व करने का सुनहरा मौका प्राप्त हुआ। तत्पश्चात, फोर्थ ईयर में मैं हॉल प्रेसिडेंट बना और अपने कार्यकाल में हॉल ईयरबुक की शुरुआत की। इस वर्ष भी जब एथलेटिक्स और क्रिकेट का स्वर्ण पदक मेघनाद साहा छात्रावास की झोली में आया तो मुझे बहुत ही ख़ुशी हुई। जहाँ बात आती है कि मैं आईआईटी खड़गपुर से क्या ले जा रहा हूँ तो मैं यह कहना चाहूँगा कि जो अनुभव मुझे यहाँ मिले, वे शायद ही किसी और स्थान पर मैं प्राप्त कर पाता। सौभाग्य से मुझे पी.पी.ओ. का प्रस्ताव आया था और मैं प्लेसमेंट के लिए भी बैठा था परन्तु अपने पिताजी के सपने को पूरा करने के लिए मैं यू.पी.एस.सी. की तैयारी कर रहा हूँ। अपने अनुभव के आधार पर जूनियर्स को यह कहना चाहता हूँ कि अपने जीवन का आनंद उठाओ और जो करना चाहते, वो करो। लकिन जो भी करो, अपनी बुद्धिमता से करो।

Sarthak Jain

|| Civil Engineering ||

|| RK Hall ||

केजीपी की पाँच साल की यात्रा एक रोलर कोस्टर राइड की तरह रही। अगर आप रोलर कोस्टर में उदासी भरा चेहरा लेकर बैठ जाओगे तो रोते ही रह जाओगे। वहीं हर उतार-चढ़ाव का सामना ख़ुशी के साथ करोगे तो जीवन में एक अलग ही रोमांच का अनुभव होगा। मेरी रणनीति पूरी तरह एलिमिनेशन वाली रही है। कोशिश हर चीज़ के लिए करना है, पर जो अच्छा नहीं लगे उसे अपने जीवन से हटाते जाना है। इस तरह से मैं पता लगा पाया कि मुझे क्या अच्छा लगता है और क्या नहीं। इसके परिक्षण के लिए आईआईटी खड़गपुर सबसे उपयुक्त जगह है क्योंकि यहाँ सबकुछ करने का मौका मिलता है। जब प्रथम वर्ष में यहाँ आया था तो देखा कि सोसाइटियों में जाने की रैट रेस लगी हुई है। मैं भी उसमे शामिल हो गया, पर मुझे जिसकी पूरी जानकारी थी वहाँ मुझे लिया ही नहीं गया (रोबोटिक्स) । मुझे बहुत बुरा लगा था और जब विंटर वर्कशॉप हुई थी तो मैंने उन्हें दिखा दिया था कि मुझमें कितनी क्षमता है। फर्स्ट ईयर में कुछ सीनियर्स के इस सलाह ने कि सीजीपीए से कुछ नहीं होता, मेरे लिए मुश्किलें खड़ी कर दी थीं। तब से मैं समझ गया कि किसी भी सलाह पर खुद के विचार से काम करना चाहिए। केजीपी की जिंदगी से मुझे हर मोड़ पर कुछ-न-कुछ सीखने को मिला है। सबसे बड़ी बात कि मैं लोगों को पहचानना सीख गया कि कौन मेरी दोस्ती के लिए उपयुक्त है और कौन नहीं। मैंने सीखा कि खुद पर निर्भर रहना चाहिए। बस अपने काम को सही तरीके से करना चाहिए, सारे दरवाजे खुद-ब-खुद खुल जाएंगे। सबसे अधिक सीखने को मिलता है अपनी असफलताओं से। वे जब दिल में चुभती हैं न, तो अक्ल आती है और कुछ करने का जूनून पैदा होता है। तीसरे साल में मैं यहाँ पर हो रही रैट रेस देख कर बौखला गया था और सोच रहा था कि यहाँ से ड्रॉपआउट करके कुछ अपनी रूचि का करूँ। पर मेरे पिताजी ने समझाया कि मुझे धैर्य से काम लेना चाहिए। जब उस साल के अंत में मुझे फॉरेन ट्रेनिंग का मौका मिला तो मैंने उसे पूरे सकारात्मक तरीके से लिया। आज मुझे लगता है कि मेरे जीवन का टर्निंग पॉइन्ट वही है क्योंकि वहाँ पर मैंने बहुत कुछ सीखा, चाहे वह एकेडेमिक्स के बारे में हो या जीवन के बारे में। मन में एक कमिटमेंट की भावना आ गयी। सोच लिया कि जो भी करूँगा, जी-जान से करूँगा। यही सुझाव मैं अपने जूनियर्स को भी देना चाहूंगा कि अपनी प्रतिभा को पहचानो और उसे साकार करने में दिलोजान से जुट जाओ। सीखने के लिए उनलोगों से मेलजोल बढ़ाओ जिनकी रूचि तुम्हारी रूचि से मिलती है। इससे दोनों तरफ के लोगों का भला होता है। बस सुझाव सबकी लो, पर फैसला खुद से करो। वही तुम्हारे हित में होगा।

Sarthak Badjatya

|| Humanities and Social Sciences ||

|| Azad Hall ||

मुझसे पूछो तो केजीपी मेरे लिए पीस का पर्याय है; यहाँ की आज़ादी, मस्ती, अलग-अलग प्रतिभाशाली दोस्त और उनकी दोस्ती - ये अब और कहाँ मिलेंगे? बस इसी वजह से मेरी जिंदगी का सबसे खूबसूरत भाग यहाँ बिताया समय है। मैं फर्स्ट ईयर में MMM हॉल में था जहाँ मैं अपना अधिकांश समय केवल अपने इंदौर के दोस्तों के साथ ही बिताया करता था। मेरा रुझान पहले ही मार्केट, कारोबार आदि में रहा था और यहाँ आने के बाद मैं बी-क्लब का सदस्य बन गया। भाग्य से मेरे शहर के दोस्त भी इससे जुड़ गये और हमारा घूमना-फिरना, रहना और मौज-मस्ती - सब साथ में ही होने लगी। हमने अलग-अलग कौशल भी साथ-साथ ही सीखे। अगले वर्ष आज़ाद आया, कुछ दोस्त छूटे लेकिन जैसे-जैसे ओ.पी. हुई तो पूरे बैच से ही अपनापन हो गया। यहाँ पर सीनियर्स का बार-बार अपने अपने जूनियर्स को हॉल की गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रेरित करना न केवल उन्हें खुलने में मदद करता है बल्कि आपसी आत्मीयता को भी बढ़ाता है। मैंने भी यहाँ केस स्टडी और प्रॉडेक्ट डिज़ाइन में भाग लिया। मैं अपनी टीम के साथ वैल्युएशन ओलम्पियाड में विश्व की शीर्ष दस टीमों के बीच अपना स्थान बनाने में सफल रहा। साथ ही बी-क्लब में गवर्नर रहते हुए उसे जिमखाना में शामिल करवाना भी मेरे जीवन की एक उपलब्धि रही। इन सब के दौरान सीनियर्स की सलाह का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। यहाँ पाँच साल रहकर मैंने जो मित्र बनाए उनके साथ न केवल मेरा तकनीकी ज्ञान बढ़ा बल्कि आत्मविश्वास में भी सुधार आया और इन्हीं दोस्तों के साथ मैंने अपनी पसंदीदा टिक्का की चाय पीते हुए समय बिताया, जहाँ किसी प्रोफेसर का मिल जाना हमेशा एक डरावने सपने जैसा रहा। जूनियर्स से मैं कहना चाहूँगा कि जो भी परेशानी हो, वो तुम सीनियर्स को बताओ। नयी कलाएँ या कौशल सीखने की इच्छा पूरी करो, लेकिन अंततः यह मालूम रखो कि तुम्हें किस क्षेत्र में आगे बढ़ना है। जो भी करो, बस इतना ध्यान में रखो कि आपको इससे क्या सीखने को मिलेगा। केवल करने की औपचारिकता पूरी करने के लिए काम मत करो। साथ ही अपने काम में प्रोफेशनल बनने का भी पूरा प्रयत्न करो। यह तुम्हारे लिए बेहतर परिणाम लाएगा।

Shaique Mustafa

|| Physics ||

|| RP Hall ||

मेरे लिए यहाँ बीते हुए पांच साल बेहद ही प्रभावशाली रहे हैं। इसी दौरान अपने आप को परिपक़्व होते हुए देख सका। शुरुआत में, मैं भी सभी की तरह एक विचारहीन मस्तिष्क के साथ आया था। मेरे मन में उस वक्त भविष्य की ईमारत को बनाने के लिए ईंटे तो थी परंतु कमी थी कारीगर की। और ये पूरी कारीगरी की केजीपी ने, जिसने मेरे व्यक्तित्व को मजबूती और सुन्दरता दोनों प्रदान की है। मैंने यहाँ बहुत सारी नयी नयी चीज़ें सीखीं और अपने हुनर को निखारा। केजीपी की सबसे अच्छी बात यह है कि यहाँ आपके चारों तरफ अलग तरह के लोग मिलते हैं और हम सभी एक दूसरे से कुछ न कुछ सीख सकते हैं। मैंने अपने हाल के साथ रहकर केस-स्टडी में भाग लिया, इसी में मैंने चीजो को प्रेजेंट करने और उन्हें धाराप्रवाह रूप से व्यक्त करने की कला सीखी। इसके आलावा मै स्प्रिंगफेस्ट की टीम का सदस्य भी रहा जिसमे मैं मेनेजमेंट (प्रबंधन) सम्बन्धी गतिविधियों में जुड़ा रहा। मैंने यहाँ अनुभव किया है कि चीज़ों को सीखना आसान होता है क्योंकि सीनियर्स ,प्रोफेसर्स एवं दोस्त - इनमें से कोई न कोई आपकी उस क्षेत्र में मदद कर सकता है। मैंने अपनी फाइनेंसियल मेनेजमेंट की कला को भी यहाँ रहकर नयी ऊंचाइयों तक पहुचाया। एक बात जो मैं खुद में देख पाता हूँ, वह यह कि मुझमें मेरे पसंद के काम को करने की जिद्द भरी होती है। मैं हमेशा उनमें अपना सर्वोच्च देकर सर्वोत्तम हासिल करना चाहता हूँ। जब भी समय मुश्किल और कठिनाइयों से भरा हुआ होता था तब-तब मैंने अपने "विन्गीज" को हमेशा मेरी सहायता क लिए तत्पर पाया है। केजीपी में रहकर मस्तियों के साथ जो हम सीखते हैं, वह अद्वितीय है।

Shambhobhi Bhattacharya

|| Mechanical Engineering ||

|| SN/IG Hall ||

कहा जाता है कि जगह को वहाँ के रहने वाले लोग बनाते है, पर यह जगह वैसे भी बहुत सुंदर है। हर सुबह जब हम छेदिज से वापस आते हैं तो यह जगह काल्पनिक और सुंदर लगती है। यहाँ की ज़िन्दगी मेरे लिए एक तूफ़ान की तरह है - हमेशा कुछ न कुछ चलता ही रहता है। पहले साल के दौरान मैंने अच्छे से पढ़ाई की। मैंने भौतिक विज्ञान विभाग से मैकेनिकल विभाग में डिपार्टमेंट बदला। मैं स्पोर्ट्स में काफी शामिल रही हूँ, मुख्यतया बास्केटबॉल और टेनिस में। मैं पहले से यहीं रही हूँ, हर साल स्प्रिंगफेस्ट देखती थी तो मेरी हमेशा से इच्छा थी कि मैं उस टीम का एक हिस्सा बनूँ। इसलिए मैं स्प्रिंगफेस्ट की डेको टीम का हिस्सा बनी। मुझे गाने का शौक था इसलिए मैं WTMS की भी सदस्य बनी। BTDS के साथ एक नाटक में भी शामिल हुई। दूसरे साल मैं TDS के साथ जुड़ी क्योंकि मुझे नृत्य में रूचि थी। इस साल मैं WTMS की गवर्नर थी। अपने गवर्नर के कार्यकाल में मैंने संगीत की तकनीकी बातों के बारे में काफी कुछ सीखा। मुझे लिखना और पब्लिक स्पीकिंग अच्छा लगता है। मुझे यह एक अफसोस रहेगा कि मैं आवाज़, TSA या DebSoc जैसे किसी सोसाइटी का हिस्सा नहीं बन पायी। यहाँ का स्टूडेंट कल्चर बहुत अच्छा है। इल्लू यहाँ की एक बहुत ख़ास चीज़ है। मैं हर साल चटाई चढ़ाती थी। वह एक अलग ही अनुभव होता है जब सब टेम्पो में मिलकर काम कर रहे होते हैं। फिर वह जल्दी जल्दी में साड़ी पहनना, ये सब मुझे याद आएगा। मुझे रचनात्मक क्षेत्रों में रूचि है। आगे मेरी इच्छा है कि मैं तकनीक और रचनात्मकता से मेल खातीं चीज़ें करूँ। मुझे मेरा आखरी प्रोडक्शन हमेशा याद रहेगा जब पिंक फ्लॉयड का वो गाना चल रहा था। चारो तरफ अँधेरा था और बस एक वीडियो चल रहा था। उस समय मेरी आँखें भर आयीं और मुझे यह एहसास हुआ कि यहाँ का समय अब ख़त्म होने वाला है। इस जगह ने मुझे मेरे जीवन की अविस्मरणीय यादें दी हैं।

Shraddesh Chandra

|| Civil Engineering ||

|| Azad Hall ||

मैं केजीपी बहुत सारी उम्मीदें लेकर आया था और उन सभी को पूरा करने के लिए इस संस्थान ने मुझे पर्याप्त मौके दिए। मैं आज जो भी हूँ, केजीपी और अपने हॉल की बदौलत हूँ। यहाँ मुझे न केवल अवसर और प्रतिस्पर्धात्मक माहौल मिला बल्कि संघर्ष और हार ने भी बहुत कुछ सिखाया है। मैं अपने फर्स्ट ईयर में ही कॉलेज की फुटबॉल टीम का हिस्सा बन गया था और सैकेंड ईयर में आज़ाद हॉल आकर हॉल के लिए फुटबॉल खेलने लगा। हॉल के लिए खेलते हुए चार वर्षों में हमने दो बार लगातार गक फुटबॉल में गोल्ड जीते और उनमें से एक बार मेरी कप्तानी में। अपने समर्पित जूनियर्स और प्रेरणादायी सीनियर्स के साथ खेलने का वह अनुभव मेरे लिए सुखद रहा। मेरी टीम से मेरा काफ़ी भावनात्मक जुड़ाव भी रहा है और उसे बेहतर बनाने के लिए मैंने अपनी ओर से हर संभव प्रयास किया है। किसी भी टीम स्पोर्ट में एक बात महत्वपूर्ण है - "You sail or sink TOGETHER"। यह ध्यान में रखकर हमने अपने अभ्यास पर पूरा ध्यान दिया। इसके अलावा मैं इस बार कोरियोग्राफी टीम का हिस्सा रहा और एथलेटिक्स में भी भाग ले चुका हूँ। अब जब मैं केजीपी में नहीं रहूँगा तो मुझे सबसे ज़्यादा याद TSC (टाटा स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स) की ही आएगी, जहाँ मैनें केजीपी की जिंदगी का एक बड़ा भाग गुज़ारा है। साथ ही यहाँ त्यौहारों में मौहाल देखकर घर जैसा ही महसूस होता है। एक बड़ी ही मज़ेदार याद भी जुड़ी हुई है यहाँ की दिवाली से। मैंने कभी अपने दोस्तों की तरह दिन-रात इल्लू में काम नहीं किया लेकिन जब मैं त्यौहार के दिन गेट पर दीये जला रहा था तभी किसी ने उस पल की फोटो खींच ली और अगले दिन वह तस्वीर Cultural, IIT Kharagpur के पेज पर इल्लू के दौरान मेरी ‘मेहनत’ को दर्शाते हुए दिखाई गयी। उस दिन मेरे दोस्तों के चेहरे के भाव देखने लायक थे। मेरे लिए मेरे खेल के अलावा इंटर्नशिप व प्लसेमेंट का समय भी काफ़ी चुनौतीपूर्ण रहा। मेरा पहले फेज़ में प्लसेमेंट नहीं हो पाया था|। लेकिन मेरे अनुसार ऐसी बाधाएँ ही जीवन में आपको बड़ी चुनौतियों के लिए बेहतर ढंग से तैयार करतीं हैं। आपका उनके प्रति रुख़ सकारात्मक होना चाहिए। अंततः यही कहना चाहूँगा कि हर विद्यार्थी को अपनी रुचियों को पहचानने के लिए अलग-अलग गतिविधियों में भाग लेना चाहिए और जो अपने बारे में जानते हैं, उन्हें अपनी प्रतिभा को अगले स्तर पर ले जाने के लिए पूरा प्रयत्न करना चाहिए। यहाँ आए हो तो आलस करने में अपना समय कभी बर्बाद मत करो, कुछ नया करने का जुनून हमेशा बनाए रखो।

Shravya Pawar

|| Electrical Engineering ||

|| MT Hall ||

इन चार सालों के सफ़र में जब पीछे मुड़कर देखा तब एहसास हुआ कि हम कितने कदम आगे बढ़ गए और पता भी नहीं चला। कब हम वे डरे-से सहमे-से बच्चे थे जो घनघोर बारिश में अपने "रेजिस्ट्रेशन डॉक्युमेंट्स" का बटुआ बचाए कालिदास ऑडिटोरियम के सामने 'नदियाँ' पार कर रहे थे और कब यह वक़्त आ गया कि हमें कड़ी धूप में इस कैम्पस से विदा होना पड़ेगा। अभी भी याद है वो पहली कक्षा जिसमें अध्यापक ने साफ-साफ बोल दिया था कि "बच्चों, लिख कर ले लेना। तुम किसी काम के नहीं हो और किसी काम के नहीं रहोगे।" शायद इन्हीं शब्दों की वजह से हम आज इतने काबिल हो गये हैं कि ज़िंदगी के किसी भी मोड़ में किसी भी कष्ट का डटकर सामना कर पाएँगे और खरे उतरेंगे। आइआइटी खड़गपुर - यहाँ जितनी मस्ती हॉल, सोसाइटीस, नाइट-आउट्स के नाम पर होती थी, "डिपार्टमेंट ऑफ एलेक्ट्रिकल इंजिनियरिंग" इसका पूर्ण रूप से ख़याल रखता था कि हम अपनी आज़ादी की सीमा के बाहर कहीं भटक न जाएँ। कहने का तात्पर्य यह है कि आइआइटी खड़गपुर ने हमारा एक माँ की तरह पालन-पोषण किया है। पोषण से याद आया कि ज़िंदगी में पहली बार मैंने इतने आलू देखे होंगे। हर जगह आलू, हर पकवान में आलू, चिकन में भी आलू ! बच्चों की भूख मिटाने के चक्कर में यहाँ के कैंटीन्स इतने रचनात्मक हो जाते हैं कि सिर्फ़ अंडा और ब्रेड के पचास से भी ज़्यादा तरह के पकवान मिल जाएँगे। याद आएँगे वो पल जब कक्षा के बाद सी.सी.डी. जाते, लेक-साइड पर बकर मारते, रात में बी.आर.अंबेडकर हॉल की छत पर ठंडी हवा का मज़ा लेते, फिर 2.2 की भाट में दुनिया के हर कोने की खबर पर चर्चा करते-करते स्कॉलर्स अवेन्यु के पेड़ों के कवच को चीरते हुए सूरज की किरणों को कैम्पस को उज्ज्वलित करते देखते और फिर भूख लग जाने पर छेदीस की गरमा-गरम चाय से नए दिन की शुरुआत करते। याद तो ज़रूर आएँगे वो पल। पहले साल से ही कैम्पस की विभिन्न सोसाइटीस और हॉल की मदद से अपनी प्रतिभा को दुनिया की नज़रों में लाने और अपनी सी.वी. भरने के लिए कैम्पस ने बहुत सारे द्वार खोले रखे हैं। लेकिन एक बात मुझे हमेशा ख़टकती रही कि हम कहीं न कहीं इस भाग दौड़ में अपने आप को ही भूल जाते हैं और जुगाड़ के जंगल में फंसकर मेहनत करना भूल जाते हैं। मैं बस इतना कहना चाहती हूँ कि यहाँ आने के बाद आगे बढ़ने के मौके बहुत होते हैं लेकिन सी.वी. बनाने के चक्कर में सी.जी. मत भूल जाना। जो भी करना, दिलो-जान से करना। आए थे हम एक खाली किताब लेकर, जा रहे हैं एक पुस्तकालय भरकर, इन मुलाकातों में कुछ बने, कुछ बिछड़े, लेकिन ये धागे हमेशा के लिए बँध गए न जाने कैसे बीत गये ये सारे पल, ये जोशीले तरंग अब यादों में समा गए।

Shruti Sarode

|| Biotechnology and Biochemical Engineering ||

|| SN/IG Hall ||

आईआईटी खड़गपुर और यहाँ पर मेरी ज़िन्दगी के पांच साल मेरी जिंदगी की सबसे अच्छी चीज़ों में से एक हैं। यहाँ आने से पहले मैं ज़्यादा उत्सुक नहीं थी और मैंने सोचा था कि यहाँ सिर्फ मग्गू लोग ही मिलेंगे लेकिन शुक्र है कि मैं गलत साबित हुई। मैं यहाँ कुछ लोगों से मिली जो कि न केवल बुद्धिमान थे, बल्कि बहुत रचनात्मक भी थे। हम सभी इन पांच सालों में साथ-साथ बड़े हुए और साथ ही बहुत मस्ती की। ट्रिप्स, नाईट-आउट्स और इसी तरह पांच साल कैसे बीत गए, पता ही नहीं चला। यहाँ पर मुझे एक्सपोज़र मिला और मुझे ये सबसे अच्छी बात लगी। मैं एक पर्यावरणविद हूँ और सेकंड ईयर से ही मुझे पर्यावरण से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर काम करने का अवसर मिला और इसके कारण ही मुझे तीन देशों में यात्रा करने का मौका मिला। मुझे और मेरे कुछ दोस्तों को हमारे प्रस्ताव 'वेस्टवाटर ट्रीटमेंट' को पेश करने के लिए टर्की आमंत्रित किया गया और इस प्रस्ताव के लिए हमें अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार 'Green Brain of the year 2016' मिला। मुझे बचपन से ही गाने का शौक था और मैं हमेशा से ही एक बैंड का हिस्सा बनना चाहती थी और केजीपी ने मेरे इस सपने को भी पूरा किया। मैं WTMS में शामिल हुई और मुझे कई सारे प्रतिभावान लोगों के साथ प्रस्तुति देने का अवसर मिला। इससे मुझे अपने मंच के भय से छुटकारा मिला। मुझे इतने सारे अद्भुत अवसर और पूरी जिंदगी साथ देने वाले दोस्त देने के लिए मैं केजीपी को तहे दिल से धन्यवाद करना चाहती हूँ।

Shubham Kedia

|| Chemical Engineering ||

|| Azad Hall ||

मैं जब पहली बार केजीपी आया तब मैंने प्लसेमेंट या उच्च शिक्षा के बारे में कुछ नहीं सोचा था। यहाँ आकर जब जाना की खड़गपुर शहर से बहुत दूर की कोई जगह है जहाँ गर्मी भी असहनीय लगती थी, तब से मैं बस यही सोच रहा था कि क्यों यहाँ आया और कब निकलूँ। लेकिन आज जा रहा हूँ तो आँखों में आँसू हैं। मुझे यहाँ का जूनियर और सीनियर के बीच सीखने और सिखाने की संस्कृति सबसे अच्छी लगी जो मुझे हमेशा याद भी रहेगा। मैं जब प्रथम वर्ष (एम.एम.एम. हॉल) में था तभी से मैंने अपनी पसंद के क्षेत्रों में हाथ आजमाना शुरू कर दिया था। यहाँ TFPS और spAts का हिस्सा बना, स्क्वॉश खेला और फुटबॉल भी खेलने लगा। मगर मैंने मन में यह निश्चय भी कर रखा था कि एकेडमिक्स पर आवश्य ही ध्यान दूँगा। मेरा डिपार्टमेंट चेंज करने का मन था पर मैंने हमेशा अपना सर्वश्रेष्ठ करने पर ज़्यादा ज़ोर दिया और अंततः मैंने केमिस्ट्री से केमिकल इंजिनियरिंग विभाग प्राप्त कर लिया। द्वितीय वर्ष में मैं आज़ाद हॉल में आया और यहाँ आकर मुझे एहसास हुआ कि हॉल टेंपो क्या होता है। मैंने हॉल के लिए फुटबॉल खेलना शुरू किया और तब मेरे मन में जीतने की अभिलाषा चरम पर हुआ करती थी। हॉल के लिए कुछ भी कर सकने के जज़्बे ने मुझे उसके काफ़ी करीब ला दिया। TFPS में रहते हुए टीम के साथ Shit Freshers Say! शीर्षक की मूवी बनाई जो आज भी बहुचर्चित है। इसकी सफलता की खुशी आज भी मन को सुकून देती है। इसी तरह मैं अपनी आवश्यकता और रूचि के अनुसार भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में अपना समय देता रहा। अपने अगले वर्ष मैंने Chem Quest और एड डिज़ाइन में भी भाग लिया। यह एकडेमिक वर्ष मेरे लिए सुख और दुःख दोनो लेकर आया। मुझे पहले सेमेस्टर में एक प्रतिष्ठित कंपनी में इंटर्नशिप मिल चुकी थी लेकिन जिस शख्स ने इसमें मेरी काफ़ी मदद की थी, वे थर्ड ईयर के अंत में बाइक दुर्घटना में चल बसे - मुर्तज़ा फ़लासिया, जिसके जाने का दुःख हम सभी दोस्तों को आज भी कचोटता है। आगे मुझे उसी कंपनी से पी.पी.ओ. भी मिला जो मैने स्वीकार नहीं किया और अपनी पसंद के अनुसार फिर प्लसेमेंट्स में बैठा, फिर सफल हुआ। मगर अंत में, मैं केमिकल इंजिनियरिंग में एम.एस. के लिए बाहर पढ़ने जा रहा हूँ। मैं अपने साथियों से यही कहना चाहूँगा कि जो भी करो उस पर पछतावा न करो क्योंकि हर सेमेस्टर, हर ईयर तुम्हे कुछ न कुछ सिखाएगा। लेकिन पश्चाताप तुम्हे पीछे देखने को मजबूर करेगा। साथ ही मैंने अपने इन वर्षों में यही जाना कि किसी का दिल नहीं दुखाना चाहिए क्योंकि तुम्हारा किया ही तुम्हारे पास आएगा, मगर ‘ब्याज के साथ’। मुझे याद है, मेरे फर्स्ट ईयर में मुझे मेरे करीबी दोस्त से मेरे जे.इ.इ. में कम मार्क्स और डिपार्टमेंट के बारे में बहुत कुछ बुरा-भला सुनने को मिला जिससे मैं काफ़ी आहत हुआ। आज मैं उससे कुछ कहता नहीं, पर उसे और सभी को पता है कि मैं भी समर्थ हूँ। इसलिए जब भी मौका मिले लोगों को हँसाओ और कठिन क्षणों में उनकी मदद करो (क्योंकि यही निर्णायक समय होता है) ताकि जब वो तुम्हें याद करें तो उनके चेहरे पर खुशी झलके।

Shubham Sharma

|| Computer Science and Engineering ||

|| Nehru Hall ||

मदन मोहन मालवीय हॉल की विशालता शायद इस फ़च्चे का मन मोह पाती, इससे पहले ही घर से दूर रहने के कष्टों ने मेरा हाथ थाम लिया था। घर की साफ़-सफाई, माँ के हाथों से बने स्वादिष्ट खाने की खुशबू जैसे सुख अब कहाँ नसीब हो पाते, अब हम बाहर पढ़ने जो आ गए थे। शुरुआत में अंतर्मुखी स्वभाव का होने के कारण मुझे अपने साथियों से ही बात-चीत शुरू करने में कठिनाई का सामना करना पड़ा, परंतु एक बार अच्छी तरह पहचान हो जाने के बाद वो मेरे काफ़ी अच्छे मित्र बन गए। प्रथम वर्ष किसी भी विद्यार्थी के लिए नई विविधताओं का अनुभव करने के लिए होता है, नई चीज़ें जान पाने और उन्हें आज़माने का यही सही वक़्त होता है। पूरा कैम्पस घूमा, नए दोस्त बनाए और काफ़ी सारे नए अवसरों का अनुभव किया। हालाँकि कुछ सोसाइटीस में चयन नहीं हो पाया, पर जब आवाज़ में मेरा साक्षात्कार हुआ तब मुझे लगा कि यह अवसर मेरे लिए ही बना था। हिन्दी के प्रति लगाव मेरे जीवन की एक प्राथमिकता है और आवाज़ में मुझे अपने जैसे ही लोग मिले जो इस क्षेत्र में प्रतिष्ठित थे और मेरे इस स्वभाव को और प्रबल करने में मुझे बढ़ावा दे सकते थे। मुझपर किए गए इस भरोसे का मैं काफ़ी आदर करने लगा और इसी आदर से उपजा आवाज़ के प्रति मेरा सेंटो ! आवाज़ जैसी संस्था से जुड़े होने के कारण लोग मुझे पहचानने लगे और काफ़ी सारे दोस्त बने। यहाँ आकर मेरी भेट काफ़ी ज्ञानी लोगों से हुई जिन्होने हर पथ पर मेरा मार्गदर्शन कर मेरी प्रतिभा को निखारा, मुझे संपूर्ण बनने की सीख दी और अपनी कमियों-ग़लतियों को समझ पाने की बुद्धि दी। आवाज़ ने मुझे सोचने का तरीका सिखाया। प्रथम वर्ष बीत जाने के बाद कुछ नई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। पढ़ाई का बढ़ता लोड और अपने जीवन की अनियमितताओं को साथ संभालना कुछ कठिन लगने लगा था। परंतु जैसे जैसे समय चढ़ता गया, इन परेशानियों से लड़ने में मैं सक्षम होता गया। चौथे सेमेस्टर तक मुझे समझ आ गया था कि पढ़ाई काफ़ी महत्त्व रखती है और इस ओर प्रयास करने के लिए मैं कटिबद्ध हो गया और मैंने फ़ेसबुक की मोह-माया त्याग दी। परंतु इन कर्मों का मेरी सी.जी. पर ज़्यादा प्रभाव न पड़ने पर मेरा यह भ्रम तो टूट ही गया कि मगने से मेरा ज़्यादा भला होने वाला था! अब थी इंतर्नशिप की बारी। ज़्यादा तैयारी न कर पाने का नतीजा था कि इंटर्नशिप के लिए कुछ संघर्ष करना पड़ा, पर जैसे ही मेरी इंटर्नशिप लग गई, फ़ेसबुक से मेरा बैर मैंने समाप्त कर दिया! इसी सरीखे एक और घटना थी मेरी जीवन में - प्लेसमेंट! दिल्ली से होने के कारण मुझे ऐसी नौकरी की तलाश थी जो मेरे घर के आसपास हो। परंतु ऐसा कोई अवसर दिखाई नहीं पड़ा। आई.बी.एम. के साक्षात्कार के परिणामों की घोषणा से दस मिनट पहले प्लेस कॉम का वो कॉल कि "स्प्रिंक्लर में ट्राइ करोगे?" आज भी याद रहेगा! ये था किस्मत का फेर और मैं पूरे आत्मविश्वास से उस कंपनी के साक्षात्कार में बैठ पाया और उस कंपनी का हिस्सा भी बन पाया। अंत में, मैं अपने जीवन से सीखा कि जीवन में दो चीज़ें काफ़ी महत्त्व रखती है - अच्छा इंसान बन पाना और अपनी प्राथमिकताओं को पहचानना। अपने जीवन की अनियमितताओं से जो मैंने सीखा उसके आधार पर आगे आने वाली जनता को बस यही कहना चाहूँगा कि यदि तुम्हारे निर्णय बदलते रहते हैं तो घबराना नहीं चाहिए क्योंकि यही एक मात्र निशानी है कि तुम्हारे दिमाग़ ने काम करना बंद नहीं किया है, अभी भी सोच पाने के काबिल हो तुम।

Shyam Simaria

|| Industrial and Management ||

|| Azad Hall ||

केजीपी में एक नये विद्यार्थी के तौर पर जब मैं यहाँ आया तब अपने भविष्य को लेकर सुनिश्चित नहीं था। एक बिल्कुल नये हॉल LBS में आकर मेरा अधिकांश समय मौज मस्ती में गुज़रा लेकिन सैकंड ईयर में आज़ाद हॉल आकर मुझे काफ़ी नये अवसर और अनुभव मिले। यहॉं मैंने अपने कम्फ़र्ट ज़ोन से बाहर आना शुरू किया। ओपन आईआईटी ड्रामा में भाग लिया। हॉल में ड्रामा सेक्रेट्री भी रहा। यहीं से मेरे अंदर बदलावों की शुरूआत हुई। मेरा उस वर्ष जीसी के ड्रामा इवेंट में एक खास अनुभव रहा। पूरी टीम के साथ हम इसके लिए काफी मेहनत कर चुके थे और प्रस्तुति कुछ ऐसी रही कि हम सभी को आत्मसंतुष्टि हुई और आशानुसार अंततः हमने ही खिताब हासिल किया। इसी तरह रंगोली में टीम के साथ प्रस्तुति देते ही मैंने कैप्टन से जीत का दावा कर दिया था और फिर मैं सही साबित हुआ। मेरे मत से परिणाम से ज़्यादा महत्त्व इस जीतने के जज्बे की भावना का है जो आसानी से नहीं आती। मैें आगे आज़ाद हॉल का हॉल प्रेसिडेंट भी बना। इन वर्षों के दौरान मैंने जाना कि हॉल के सभी इवेंट्स जैसे इल्लू किस तरह एक बेहद ही सुनियोजित रणनीति से पूरे होते हैं। इनमें भाग लेने का क्या महत्त्व होता है। यहॉं विभिन्न जिम्मेदारियों पर रहकर व ड्रामा के ज़रिये मैंने अपने आप को आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत करना और कठिन परिस्थितियों का सामना करना सीखा। अब आगे मैं कहीं भी जाऊं, भीड़ से अलग चलने का साहस रखता हूँ। यहॉं के जीवन के बारे में मेरी एक व्यक्तिगत राय है कि अकेले रहकर काम करने के बजाय साथ मिल-जुल कर काम करना चाहिए। आज इंटरनेट और लैपटॉप पर छात्र इतना समय व्यतीत करने लगे हैं कि हॉल में रहते हुए भी अनजान से होते जा रहे हैं। ऐसा जीवन आसान और लुभावना तो लगता है मगर आगे बढ़कर यही परिस्थितियॉं अवसाद पैदा करती हैं। अतः केजीपीयन्स से यही कहना चाहूँगा कि यहॉं मौकों की कोई कमी नहीं है। अगर तुम अपने लक्ष्य को नहीं पहचानते तो घबराये बिना नये क्षेत्रों में हाथ आजमाओ और तृतीय वर्ष तक अपनी अपनी वास्तविक रूचि को पहचान लो। इस दौरान आने वाली चुनौतियों को स्वीकार करो। नए लोगों के साथ मिलकर काम करो क्योंकि जब तक ये संघर्ष नहीं होगा तब तक कुछ वास्तविक नहीं सीख पाओगे।

Siddarth Gurbani

|| Electronics & Electrical Communication Engineering ||

|| RK Hall ||

केजीपी ने मुझे अनगिनत यादें और बहुत सारे अनुभव दिए हैं |यह जगह संभावनाओं से अटी पड़ी है क्योंकि यहाँ कैंपस में ही करने के लिए बहुत कुछ है| यहाँ मैंने अनेकों गतिविधियों में भाग लिया पर सबसे ज़्यादा दिलचस्पी मुझे खेल में रही और खेल ही मेरे केजीपी के जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा रहा| फर्स्ट ईयर में मैं MMM हॉल में था, तभी से फुटबॉल खेलने लगा और इंटर-आईआईटी की तैयारी भी शुरू की| साथ ही मुझे गिटार बजाने और संगीत का भी शौक था| स्कूल में ही मैंने इलेक्ट्रॉनिक्स में रूचि विकसित कर ली थी और अब आगे भी इसी क्षेत्र में जाना चाहता हूँ| मुझे याद है, मैं सैकेंड ईयर में LBS हॉल से बदलकर RK हॉल में गया और वहाँ OP मेरे लिए काफ़ी मनोरंजक अनुभव था, इतना कि जब तक मुझे कमरा न मिला, मैं रोज़ LBS से RK जाया करता था| इसके अलावा इल्लू मेरे लिए न केवल हॉल संस्कृति का एक अदभुत नज़ारा रहा बल्कि सीनियर से मित्रता बढ़ाने का माध्यम भी, इसलिए इंटर-आईआईटी के अभ्यास के बाद मैं पूरे जोश के साथ इसमें हिस्सा लेता था| | मुझे लगता है कि केजीपी कि ऐसी अनोखी चीज़ें ही लोगों को जीवन में एक अलग ही ख़ुशी दे जाती हैं| मैंने उसी साल में RK के लिए इंटर-हॉल में गिटार भी बजाया| मेरे फुटबॉल टीम के सीनियर्स से मेरी काफ़ी अच्छी दोस्ती रही और मैं आज भी उनके संपर्क में रहता हूँ| मुझे सैकेंड ईयर में इंटर-आईआईटी टीम के साथ आईआईटी बॉम्बे जाने को मिला जबकि मुझे इंटर-आईआईटी फुटबॉल टीम के लिए खेलने का मौका नहीं मिल पाया| मेरे लिए मेरा थर्ड ईयर सबसे ज़्यादा चुनौतीपूर्ण था क्योंकि मैं उस समय G .Sec, प्रोजेक्ट, इंटर-आईआईटी और इंटर्नशिप के लिए भी मेहनत कर रहा था और आश्चर्य की बात है कि उसी साल मेरी सबसे अच्छी CGPA आयी| मैंने फुटबॉल से यह सीखा कि इससे तुम ज़्यादा अनुशासित हो जाते हो और समय कि कीमत समझ आती है| मेरा यहाँ अंतिम साल भी इंटर-आईआईटी और प्लेसमेंट में गुज़रा और मैं अपनी मेहनत बहुत संतुष्ट हूँ| मैंने अपने इन चार सालों में केजीपी में बहुत सारे बदलाव देखे| उनमें से सबसे प्रभावशाली बदलाव NSO परीक्षण (ट्रायल्स) थे| हमारे कॉलेज की इंटर-आईआईटी टीम को सुधारने के लिए हमने अपने थर्ड ईयर में यह सुझाव दिया जो पिछले साल लागू भी किया गया| अंत में मैं यह कहना चाहूँगा कि जो भी अवसर तुम्हें यहाँ मिल रहे हैं, उनको न करने का बहाना मत ढूंढो, बल्कि उन्हें हासिल करने का कारण ढूंढो|

Sidhartha Satapathy

|| Computer Science and Engineering ||

|| LLR Hall ||

सिद्धार्थ सत्पथी, लाला लाजपत राय हॉल, कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग विभाग केजीपी ने मुझे बहुत कुछ दिया है जिसके लिए मैं इसका सदा आभारी रहूँगा। मुझे नाटक करने का काफ़ी शौक है। प्रथम वर्ष में मैंने HTDS और ETDS का ऑडिशन दिया था पर दोनों में से किसी में नहीं चुना गया। अंत में मैं एक सीनियर से विचार-विमर्श के बाद AIESEC से जुड़ गया जिसकी वजह से मुझे रूस जाने का अवसर प्राप्त हुआ और वहाँ मेरी एक बहुत अच्छी दोस्त बनी जो वापस भारत भी आयी थी। मैं दूसरे वर्ष के अंत तक AIESEC से जुड़ा रहा तथा वहाँ का अनुभव काफ़ी शानदार रहा। प्रथम वर्ष में बने मेरे दोस्त अभी भी मेरे काफ़ी अच्छे दोस्त हैं। प्रथम वर्ष में मैं MMM हॉल में रहता था। दूसरे वर्ष में LLR हॉल में आया और जिन दोस्तों को भी मेरे साथ LLR हॉल मिला, उनसे मेरी दोस्ती और भी ज्यादा गहरी हो गयी। यहाँ की संस्कृति काफ़ी लोगों से घुलने मिलने की आज़ादी देती है जो बाकी आईआईटी में नहीं है। यहाँ की हॉल-संस्कृति और कहीं भी नहीं है। मैंने प्रथम वर्ष के बाद केमिकल विभाग से कंप्यूटर साइंस विभाग में डिपार्टमेंट चेंज किया था। प्रथम वर्ष में मेरे विंग में सारे लड़के केमिकल विभाग के ही थे इसलिए उनलोगों से अभी भी मेरी ज्यादा अच्छी दोस्ती है। दूसरे सेमेस्टर में स्प्रिंग फेस्ट और क्षितिज का अनुभव काफ़ी अच्छा रहा था। प्रथम वर्ष में सबसे अविस्मरणीय अनुभव था मेरे GPL का ! सारी विंग ने इसमें काफ़ी उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया था और मेरा हाल बेहाल कर दिया था। कंप्यूटर साइंस विभाग में काफ़ी सारे असाइनमेंट मिलते हैं, इन्हें साथ में हल करने की प्रक्रिया में अपने विभाग में भी मेरे काफ़ी अच्छे मित्र बन गए। दोस्तों का इतना अच्छा समूह एक साथ मिलना असंभव सा है। OP से जुड़ी बातों को याद करता हूँ तो यह सोचकर मुझे काफ़ी हंसी आती है कि सीनियर उस दिन मुझ पर चिल्ला रहे थे। मैं इन सब बातों को ज्यादा दिल पर नहीं लेता। हॉल डे पर मैंने बारटेंडिंग करना सीखा। हॉल के लिए मैंने काफ़ी टेक स्पर्धाओं में भाग लिया है जैसे ओपन सॉफ्ट, डाटा एनालिसिस इत्यादि। दोस्तों के साथ बैठकर फुटबॉल मैच देखने का भी लुत्फ़ उठाया। दूसरे वर्ष में मैंने ओरेकल में इंटर्न की जो काफ़ी शानदार अनुभव था। तीसरे वर्ष में नोमुरा की इंटर्न में मुझे काफ़ी मेहनत करनी पड़ी थी। वहाँ के प्रतिस्पर्धात्मक माहौल में मैंने काफ़ी कुछ सीखा। केजीपी में मुझे प्रोफेसर्स का काफ़ी सहयोग मिला है। मेरे बी टेक प्रोजेक्ट में तथा अमेरिका में पीएचडी करने का निर्णय लेने में उनका योगदान काफ़ी अहम रहा है। मुझे आत्म निर्भर बनाने के लिए अपने माता पिता को काफ़ी श्रेय दूंगा क्योंकि उन्होंने मुझ पर कभी किसी चीज़ का दबाव नहीं डाला। पहले दिन पर इंटर्नशिप लगना, बाहर की नामी कॉलेजों से दाखिले का प्रस्ताव आना - ये सब सुनहरी यादों का हिस्सा हैं। दोस्तों के साथ रात को एग्गीज पर बैठकर भाट मारना मेरी सबसे मीठी यादों में से एक है। इन सब चीज़ों का श्रेय मैं इस जगह को देता हूँ, केजीपी नहीं होता तो यह सब कुछ नहीं होता। मैं जूनियर्स को यह सलाह देना चाहूंगा कि जितना हो सके उतने संपर्क बनाओ, इंटर्न में उतनी ही मदद मिलेगी। हमेशा कोई नया कोर्स या प्रोफेसरों से प्रोजेक्ट्स लेते रहो और दिल से करो। बिना समुचित प्रयास किये किसी भी चीज़ को मत छोड़ो !

Sneh Pratik

|| Physics ||

|| Nehru Hall ||

एल.बी.एस. के उस दूर दराज़ कमरे में, मैं कुछ मग्गु सा, कुछ शर्मिला सा था। डिपार्टमेंट में भी कुछ ख़ास दिलचस्पी नहीं थी, तो सोचता था कि डिपार्टमेंट बदलने की फाइट मार ही लूँ। पर खड़गपुर में फंडों के बिना कुछ संभव है क्या? आगे की कोई रणनीति नहीं थी। परन्तु एक बात की आज भी खुशी है कि मेरी सी.जी. जितनी भी है, उसमें मेरे प्रथम वर्ष का अत्यंत ही महत्वपूर्ण योगदान है। एक रोचक बात हुई इस दौरान - 'हॉल डे'। कोई भी फंडा न होने के कारण हम दोस्तों ने मिल कर आपस में मज़े कर लिए, पर यह नहीं पता था कि लोगों को बुलाना होता है, उनका सत्कार करना होता है। पहला 'हॉल डे' मख गया। द्वितीय वर्ष में नेहरू छात्रावास आना मेरे केजीपी जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। हालाँकि एक अन्य सीनियर ने मुझे के.टी.जे. में शामिल हो जाने की सलाह दी थी, परंतु मेरे हॉल के सीनियर्स ने मुझे ओ.पी.के ज़रिए इस लायक बनाया। पहले तो नेहरू के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं थी, परंतु यह सुनने में आया था कि यहाँ ओ.पी. कुछ अलग ही स्तर पर होती है। परंतु सीनियर्स द्वारा प्रोत्साहन मिला। इस दौरान काफ़ी फाइट मारनी पड़ी, पर अंत में कुछ हासिल हो जाने पर अच्छा भी लगा। इसी वर्ष मैंने क्षितिज का हिस्सा रहते हुए ही N.T.U. में इंटर्नशिप हासिल कर ली। पहली बार हवाई-जहाज़ में चढ़ना और वह भी विदेश के लिए, कुछ अलग ही अहसास था। यह वर्ष मेरे लिए बहुत यादगार रहेगा क्योंकि इतने कम समय में मैंने कई पूर्व छात्रों से काफ़ी अच्छे संबंध स्थापित किए। दोस्तों के साथ रात भर जाग कर काम करना, सीनियर्स से जीवन के, बाहरी दुनिया के वो फंडे लेना काफ़ी याद आएगा। जब मैं आज अपने उस समय को याद करता हूँ तो मुझे लगता है कि यह सब क्षितिज के कारण ही संभव हो पाया, यह मेरे जीवन में एक शिक्षक बन कर आया। परंतु मेरा तृतीय वर्ष और भी रोचक रहा इस सन्दर्भ में कि मुझे क्षितिज के स्पॉन्सरशिप टीम का हेड नियुक्त किया गया। आज भी जब वो कॉर्पोरेट संस्थान को पहला दूरभाष याद आता है, लगता है मानो मेरा जीवन फिर से खिल उठा हो। वह सिर्फ़ एक वार्ता नहीं थी, वह मेरे आत्मसम्मान को बढ़ावा देने वाला साधन था। इतने बड़े पहुँच वाले लोगों से बात करना और अपने आप को उनके सामने साबित करना, वह पहला ऐसा ऐहसास था। फिर बाद में जब मैं प्लेसमेंट कमिटी का सदस्य बना तो ये लगभग आम बात हो गई। परंतु जिस सेमेस्टर में सदस्य बना उसमें छग्गी आई थी और मुझे काफ़ी दुख हुआ था। परंतु अच्छा भी लगा कि कुछ अच्छा करने के दौरान ही यह हुआ। परंतु एक मलाल आज भी है कि किसी प्रकार के खेल-कूद में भाग नहीं ले पाया। शायद कोशिश करनी चाहिए थी, ख़ैर... आज जब इस खुशनुमा जगह से जा रहा हूँ तो काफ़ी सारी यादें लेकर जा रहा हूँ। कई सारे दोस्त लेकर जा रहा हूँ। बस इतना ही कहना चाहूँगा कि खड़गपुर ने जीने का नया तरीका दिखाया, मुझे उड़ना सिखाया !

Srinivas Jarupula

|| Humanities and Social Sciences ||

|| RP Hall ||

केजीपी एक बहुत ही अद्भुत जगह है। यह कहना गलत नहीं होगा कि यह धरती पर एक तरह का स्वर्ग है जहाँ हम पूरी कुशलता से हमारी ज़िंदगी के आगे के सफर को सुनहरा बना सकते हैं। प्रथम वर्ष में मुझे एल.बी.एस. हॉल मिला जहाँ से मेरे एथलेटिक्स के सुहाने सफर की शुरुआत हुई। मैं वहाँ एथलेटिक्स की टीम का कप्तान बना और प्रथम वर्ष में मैं पहला छात्र था जिसका चयन इंटर आईआईटी एथलेटिक्स बॉयज टीम में हुआ था। इंटर आईआईटी के समय सीनियर्स के साथ मेरी दोस्ती काफी बढ़ी और उनके साथ मैंने रूड़की के सफर में और प्रतियोगिता के समय काफी मस्ती भी की। उनका आचरण बड़ा ही उदारचरित व मित्रतापूर्ण था और उनके साथ बिताया हर समय मैं सदा ही याद रखूंगा। द्वितीय वर्ष में मुझे आर.पी. हॉल मिला और मुझे वहाँ की अद्वितीय संस्तृति काफी मनोहर लगी। यह सोचकर काफी संतोषजनक महसूस करता हूँ कि मैंने आर.पी. हॉल का जीसी में वआईआईटी केजीपी का इंटर आईआईटी में प्रतिनिधित्व किया एवं अपने संस्थान व हॉल के लिए कई पदक हासिल किये। अब जब इस सुहाने सफर का अंत आ गया है तब ऐसा लग रहा है जैसे यह सफर कितनी जल्दी बीत गया और ढ़ेर सारी यादें व अनुभव छोड़ गया। मैं मेरे केजीपियन और आरपियन के सफर को सदैव ही याद रखूंगा।

Surya Chakrabarti

|| Mechanical Engineering ||

|| RK Hall ||

मुझे लगता है कि केजीपी में बिताया हुआ समय मेरी ज़िन्दगी का काफ़ी अच्छा समय रहा| यहाँ काफ़ी कुछ नया देखने और सीखने को मिला| हाँलाकि मेरा फर्स्ट ईयर काफ़ी नीरस और अरोचक सा रहा क्योंकि मैं अंतर्मुखी (इंट्रोवर्ट) किस्म का था| मैंने उस समय DepC के लिए जमकर पढाई भी की और साथ ही मैं डिबेटिंग सोसाइटी और टीमकार्ट में भी रहा, लेकिन फिर भी मैं ज़्यादा लोगों से बात नहीं करता था| मेरा सैकेंड ईयर काफ़ी बेहतर समय रहा| उस समय मैं अपने हॉल में अपने बैच के सारे 70 लोगों को अच्छे से जान चुका था| इसका प्रमुख कारण यही था कि सैकेंड ईयर सबसे मज़ेदार और तनावहीन होता है| हम हॉल के लिए अलग अलग इवेंट्स में भी हिस्सा लेते थे| इससे मेरी एक ख़ास याद जुड़ी है जब हमें लिपस्टिक लगाकर एक सफ़ेद रंग की चिपटने वाली वर्दी में वायलिन लेकर नचाया गया था| इस जगह पर काफ़ी कुछ अनपेक्षित तुम्हारे लिए इंतज़ार कर रहा है और सैकेंड ईयर उसे आज़माने के लिए एकदम उपयुक्त समय है| थर्ड ईयर में मेरे साथ एक काफ़ी अविश्वसनीय घटना हुई जब मैंने पहले इंटरव्यू में ही इंटर्नशिप हासिल कर ली| इसके अलावा थर्ड ईयर में जब हमारे सीनियर्स के प्लेसमेंट का दौर चलता था तब हम उन्हें उत्साह देने के लिए सूट पहनकर जाते थे और उनकी प्रोजेक्ट्स में मदद भी करते थे| बीते साल के पहले सेमेस्टर में मुझे काफ़ी मेहनत करनी पड़ी और यह काफ़ी संघर्षपूर्ण रहा| मैंने शुरुआत से ही मैनेजमेंट या अन्य किसी क्षेत्र के बजाय इंजीनियरिंग में जाने का मन बना रखा था| जबकि मेरे लिए सैकेंड और फोर्थ ईयर का स्प्रिंग सेमेस्टर सबसे ज़्यादा मनोरंजक और दिलचस्प रहा क्योंकि मेरा काफ़ी समय हॉल इवेंट्स में गुज़रा| मैं यह कहना चाहूँगा कि सैकेंड ईयर में तुम्हें जितनी ज़्यादा हो सके उतनी अलग-अलग चीज़ें करते हुए अनुभव हासिल करना चाहिए और थर्ड ईयर में यह निर्णय ले लेना चाहिए कि कौनसे क्षेत्र में तुम वाकई जाना चाहते हो | पिछले सेमेस्टर एक मित्र के कहने पर ETMS जाने पर अहसास हुआ कि मुझे वहाँ काफ़ी पहले होना चाहिए था| मैं जनता हूँ केजीपी के मेरे ये मित्र हमेशा मेरे साथ रहेंगे| केजीपी ने मुझे टीमवर्क और उसका महत्व तो सिखाया ही साथ ही सबसे बड़ी सीख जो मुझे मिली है वो यह कि तुम बचपन से इस गलत धारणा में रहते हो कि तुम्हारी एक सीमा है, लेकिन तुम्हारी सीमा उससे बहुत आगे तक है|

Tanmay Jha

|| Chemical Engineering ||

|| Azad Hall ||

मेरे यहाँ बिताए चार वर्षों में केजीपी से लगाव कुछ इस तरह हो गया है कि मेरे पास घर जाने का मौका होते भी मैं लगभग हर बार यहीं रुकना पसंद करता हूँ। यहाँ आने से पहले मैं भी किसी अन्य विद्यार्थी की तरह अंतर्मुखी था और ज़िम्मेदारियाँ लेने से घबराता था, लेकिन आज अपने अंतिम वर्ष में मैं अपने आप को पूरी तरह बदले हुए रूप में पाता हूँ। यहाँ आने से पहले मन में 'कुछ नया' करेंगे, ऐसे विचार घूम रहे थे और फर्स्ट ईयर में मैंने काफ़ी कुछ करने का प्रयत्न भी किया, लेकिन उस सेमेस्टर मेरा शैक्षणिक प्रदर्शन आशानुरूप नही रहा था। मैंने उसे अंत नहीं माना और अगले सेमेस्टर में सही तरीके से समय का उपयोग करते हुए सीजीपीए को अच्छे स्तर पर बनाए रखा। मैं सैकेंड ईयर में आज़ाद हॉल पहुँचा और यहीं से मेरे व्यक्तित्व में काफ़ी परिवर्तन आए। मैंने यहाँ आकर सीनियर्स से सीखते हुए पहली बार हॉकी खेला और इसी टीम का कप्तान भी बना। इस तरह मैंने एक नया खेल सीखा और साथ ही Chem Quest में भी न केवल कप्तान रहा बल्कि पाँच सालों में पहली बार मेडल लाने में हमारी टीम सफल रही। इस तरह मेरा ज़िम्मेदारी लेने का डर दूर हुआ और नयी जगह पर हाथ आज़माने की हिम्मत पैदा हुई। इस दौरान जो सीख मैंने मेरे मन में उतारी, वह यही थी कि कुछ नया देखकर डरने के बजाय इस साहस के साथ उसमें हाथ आजमाना चाहिए कि अगर कोई सफलता हाथ न भी लगे तो भी वह कुछ न कुछ सिखाएगी। यहाँ आकर कुछ छात्र प्रतियोगिताओं में अपने से बेहतर छात्रों को देखकर घबरा जाते हैं, लेकिन अगर इसे एक चुनौती मानकर कड़ा श्रम किया जाए और उसका आनंद लिया जाए तो यही आपके लिए एक सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है। अब जब मैं यहाँ से जा रहा हूँ तो मुझे वो सब कुछ याद आ रहा है जो मैंने यहाँ अनुभव किया। यहाँ के लोग, आज़ादी और यहाँ के त्यौहार, जिनमें सबसे खास है इल्लू। इल्लू में रात भर काम करना भले ही थोड़ा कष्ट देता था लेकिन अंततः यह कुछ ऐसा था जो दीपावली के दिन न केवल हमें खुशी और संतुष्टि देता था बल्कि मैं बड़े गर्व से इसके बारे में लोगों को बताता था। मेरा अपने जूनियर्स से यही कहना है कि तुम जो कुछ भी करो, एकेडेमिक्स को हमेशा सबसे महत्वपूर्ण मानो और यह भी याद रखो कि जब तक यहाँ हो, तुम्हारी जिंदगी में लोड धीरे-धीरे बढ़ता ही है। ऐसे में परेशान होकर ग़लत कदम उठाना बिल्कुल भी समझदारी नहीं है। इस समय सीनियर्स से बात करते रहना ज़रूरी होता है। यहाँ इतने अलग-अलग तरह के लोगों में हमेशा तुम्हें कुछ ऐसे सीनियर्स मिलेंगे जो न केवल तुम्हारी तरह सोचते होंगे बल्कि तुम्हारी परेशानियों से गुज़र चुके होंगे। एक सीनियर के तौर पर मैं अपने जूनियर के काम आ सकूँ, यह मेरे लिए खुशी की बात होगी।

Vamshi Priya

|| Chemical Engineering ||

|| MT Hall ||

केजीपी में बिताये इन चार सालों ने मुझे पूरी तरह बदल दिया। आज में वो प्रथम वर्ष वाली डरी सहमी लड़की नहीं रही। और इसका पूरा श्रेय जाता है केजीपी और यहाँ के लोगों को। यहाँ मुझे समय-समय पर खुद को साबित करने का भरपूर मौका मिला, मेरी खूबियों को तराशने का मौका मिला जिस कारण आज मैं आत्मविश्वास से भरी हूँ। यहाँ के पेड़, वो 2.2 की सड़क, कैंटीन - सब कुछ बहुत खास है। इन छोटी-छोटी चीज़ों से जैसा सुकून मुझे मिलता है ,शायद ही कहीं और महसूस कर पाऊँ। मुझे हमेशा से ही इल्लू में काम करना बहुत भाता था। ऊँची चटाइयों में दीयों को सजता देखना ही दिन भर की क्लासेज की थकान मिटा देताथा। हमेशा से ही यह मेरे दिल के बहुत करीब रहा है। इसलिए जब इसे जनरल चैंपियनशिप का हिस्सा बनाया गया तो मुझे बहुत खुशी हुई। हर दिन हम उन्हीं सड़कों पर साइकिल दौड़ाते थे, नेहरू म्यूजियम पर बैठकर लम्बी बातें करते थे, पर कभी भी बोरियत नहीं हुई। केजीपी ने मुझे ऐसे अनमोल दोस्त भी दिए जिन्होंने मुझे हमेशा प्रेरित किया, मेरे साथ खड़े रहे। इन सब को छोड़ कर जाने के बारे में सोचते ही आंसू झलक उठते हैं। मैं यहाँ के हर छात्र से यही कहना चाहूँगी कि अगर राह चलते हम कहीं फंस जाएँ तो भी हमें रुकना नहीं चाहिए क्योंकि हो सकता है कि आगे आपकी परेशानी का हल आपके इंतज़ार में हो। इसलिए यहाँ मिले हर मौके को खुल कर जीयें।

Vipasha Jain

|| Humanities and Social Sciences ||

|| SN/IG Hall ||

केजीपी - यह शब्द सुनते ही चेहरे पर खुशी छा जाती है। पाँच साल पहले सभी लोगों की तरह मैं भी अपने साथ सपनों का एक पिटारा साथ लायी थी और केजीपी ने न सिर्फ उन सपनों को सच किया बल्कि मुझे बहुत कुछ दिया है जिसका कोई मोल नहीं है। फर्स्ट ईयर में मैंने देखा कि यहाँ बहुत कुछ था करने के लिए और मैंने कोशिश की कि मैं अपने शौक को आगे जारी रख सकूँ। मैं रोबोटिक्स सोसाइटी में शामिल हुई ताकि मैं रोबोटिक्स की मनोहर दुनिया को जान सकूँ। फिर मैं ड्रामेटिक्स सोसाइटी में भी शामिल हुई और वहाँ बहुत अच्छे लोगों से मेरी दोस्ती हुई। एक बार मैंने नाटक में अभिनय किया था, वह भी अपने पैरों में फ्रैक्चर के साथ। वक्त आगे बढ़ते गया और केजीपी मुझे नयी बातें सिखाता गया। दोस्तों के साथ मस्ती मज़ाक करते-करते पांच साल कब और कैसे निकल गए, पता ही नहीं चला। मुश्किलें भीआयीं, ख़ास तौर पर प्लेसमेंट कमिटी के सदस्य के रूप में मेरे कार्यकाल के दौरान। लेकिन ऐसे समय में कुछ लोग हमेशा मदद करने को तैयार रहते थे, खास तौर पर सीनियर्स। आज मेरे पास यादें हैं, जिंदगी की सीखें हैं और बहुत ही अच्छे दोस्त हैं। शब्दों में केजीपी को शुक्रिया नहीं बोल पाऊँगी और हमेशा इसकी आभारी रहूंगी।

Vishakha Sinha

|| Industrial and Systems Engineering ||

|| SN/IG Hall ||

केजीपी में मेरी जो सबसे पहली यादगार चीज़ रही है वह है मेरे सेकेंड ईयर की इल्लू। उसमे मैंने रंगोली बनाने के अलग अलग तरीके सीखे। सेकेंड ईयर में मैं देखना चाहती थी कि क्या मैं बहुत सारे काम एक साथ कर सकती हूँ या नहीं। उसके लिए मैंने स्पेक्ट्रा, टी.टी.जी. और हॉल में सेक्रेटरी भी बनी। सेकेंड ईयर पढ़ाई और इन सब में काम करते-करते कैसे बीत गया, पता ही नहीं चला। सेकेंड ईयर में मैंने मुख्य रूप से मैनेजमेंट सीखा। फिफ्थ ईयर में जब प्लेसमेंट्स का समय आया तब मुझे मेरे माता-पिता ने बहुत सहयोग किया। उस दौरान मुझे उनका कुछ और ही रूप देखने को मिला। इन पाँच सालों में मैंने बहुत कुछ सीखा है। जैसे कि जब मैं यहाँ आई थी तब मैं बहुत आलोचनात्मक हुआ करती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है क्योंकि अब मुझे समझ आ चूका है कि अगर मैं सही हूँ इसका मतलब यह नहीं है कि सामने वाला गलत है। गलती हर इंसान से होती है पर उन गलतियों से सीखना एक अच्छी बात है। यहाँ पर जो सबसे मज़ेदार चीज़ लगती थी वह है सुबह के चार बजे दोस्तों के साथ घूमना और भाट मारना। सुबह के चार बजे उस सुहाने मौसम में घूमने का मज़ा ही कुछ और होता है। सबसे अच्छी चीज़ जो मेरे साथ हुई वह प्लेसमेंट्स के समय हुई। असल में, मुझे उसी समय पता चला कि मेरे दोस्त मेरी कितनी परवाह करते हैं। प्लेसमेंट्स के समय मेरे आत्मविश्वास को बढ़ाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। अंत में, मैं यह कहना चाहूँगी कि सबको एक सूची बना लेनी चाहिए जिसमे केजीपी से बाहर जाने के पहले करने वाली सभी चीज़ें होनी चाहिए ताकि यहाँ से जाते समय कोई खेद न हो और कभी यह नहीं सोचना चाहिए कि कोई चीज़ हम नहीं कर सकते। ऐसा भी हो सकता है कि हम वो चीज़ करना ही नहीं चाहते। और साथ ही साथ पढ़ाई पर भी ध्यान रखें।

Vishal Singh

|| Electrical Engineering ||

|| Azad Hall ||

मैं जब केजीपी आया तो केवल इतना ही सोचा था कि आईआईटी में जीवन काफ़ी आसान हो जाएगा। यहाँ मेरे फर्स्ट ईयर (शास्त्री हॉल) का काफ़ी समय मेरे कुछ दोस्तों के साथ घूमने, खेलने और रूम पर ही बीता। लेकिन तब मेरी पहचान अपने बैच के ही काफ़ी लोगों से नहीं थी। जब सैकेंड ईयर में आज़ाद हॉल आया तो ओ.पी. ने बहुत से लोगों से अपनी पहचान बढ़ाने का मौका दिया और रूम पर बैठे रहने की आदत भी छूट ही गयी। मैंने फुटबॉल खेलना शुरू किया और मेरा विभाग भी इलेक्ट्रिकल इंजिनियरिंग था जहाँ अपेक्षानुसार मैं काफ़ी व्यस्त भी रहने लगा। चूँकि मुझे फुटबॉल खेलना पसंद था, मैंने निरंतरता बनाए रखी। इस सब से मैं समय-प्रबंधन और प्राथमिकताएँ तय करना सीख गया। हमारी टीम के नियमित अभ्यास और सीनियर्स के प्रयासों का ही फल मिला है कि हम लगातार दो बार इंटर हॉल फुटबॉल में गोल्ड जीत पाए। इस बार कप्तान के तौर पर मेरा काम इसी कारण काफ़ी आसान हो गया था। इसके अलावा हॉल के सभी दोस्तों के साथ ऑडिटोरियम में फुटबॉल और क्रिकेट वर्ल्ड कप के मैच देखना मेरे लिए काफ़ी यादगार पल रहे हैं। इसके अलावा 2.2 पर दोस्तों संग बकर करना, इल्लू में रात-रात भर काम करना - ये सब कुछ ऐसी यादें है जो मैं केजीपी से लेकर जा रहा हूँ। साथ ही लेकर जा रहा हूँ अनुशासन जो मैंने अपने खेल से सीखा। मैंने इंटर्नशिप के लिए तैयारी करते समय एक और महत्वपूर्ण बात सीखी कि जिस काम में आप की रूचि नहीं है उसमें भेड़चाल की तरह चलने की कोशिश कभी मत करो, क्योंकि श्रेष्ठता तब तक हासिल नहीं हो सकती जब तक स्वयं का मन उस काम से खुशी प्राप्त न करे। अतः केवल दूसरों को देखकर एक से ज़्यादा क्षेत्रों की जानकारी हासिल करने से कोई लाभ नहीं होने वाला है। और फ़च्चों से यही कहना चाहूँगा कि फाइनल ईयर में क्या होगा, इसकी चिंता अभी से न करें। यह संस्थान इतनी विविध गतिविधियाँ करने के अवसर प्रदान करता है, इनमें से किसी न किसी में जरूर भाग लें। मेरे मन में तो कुछ कसर अभी भी बाकी लगती है, इसलिए आप सभी यहाँ के मौके का पूरी तरह सदुपयोग करें।

Vishnu Sharma

|| Electronics and Electrical Communication Engineering ||

|| RP Hall ||

मेरी जिंदगी में सबसे अधिक रोमांचित करने वाले लम्हे मैने केजीपी में बिताये अपने पिछले पांच सालों के दौरान ही पाये है। यहाँ गुजारा गया हर एक दिन मुझे कुछ न कुछ सिखा कर गया है। मैंने यहाँ बहुत सी चीजों की कद्र करना सीखा है जिसमे "पैसा एवं समय" सर्वोपरि है। मेरे व्यक्तित्व में भी अत्यधिक सकारात्मक बदलाव आया है जिसे मैं केजीपी की तरफ से अमूल्य उपहार समझता हूँ। जब मैं यहाँ आया था तो काफी चीजों को लेकर डरा हुआ रहता था, परंतु यहाँ के घोल–मेल वाले माहौल ने मुझे सोचने का एक नया नजरिया दिया। मुझे शुरुआत में सीनियर्स से बातचीत करने में झिझक महसूस होती थी पर जब मैंने सीनियर्स से थोड़ी बातें करनी शुरू की तब उन सभी की अच्छी प्रतिक्रिया देख कर मैने खुद को खोलना सीख लिया। यहाँ आने से पहले मेरे पास कोई ख़ास हुनर नहीं था, परंतु यहाँ मिलने वाली अनगिनत, अनमोल अवसरों से मैंने खुद के व्यक्तित्व को सजाया है। मैंने काफी सारी गतिविधियों में हिस्सा लेकर अपनी रूचि को भी पहचाना है। मैंने यहाँ रोबोटिक्स के क्षेत्र में काम किया, साथ ही मैं हॉल की तरफ से ऐड-डिजाइनिंग एवं हार्डवेयर-मॉडलिंग में भी भाग लिया। सभी की तरह मेरे पाँच साल भी उतार-चढ़ाव से भरपूर रहे। ऐसा भी समय आया जब मैं डिप्रेशन से गुजरा, परंतु मैने हार नहीं मानी और खुद पर भरोसा रखा। केजीपी की प्राकृतिक सम्पन्नता मुझे हमेशा बहुत मनमोहक लगती रही है। मैं नकारात्मक विचारों को दूर करने तथा मन को शांति देने के लिए इसी प्राकृतिक वातावरण का सदुपयोग करता आया हूँ। तनाव के समय मैं जिमखाना के लेकसाइड पर जाकर मूवी देख कर खुद को तरो-ताजा करता आया हूँ। मेरे अनुसार हमारे केजीपी में प्रोफेसर भी काफी सहायक स्वभाव के हैं। केजीपी ने मुझे काफी बड़े अवसर भी प्रदान किये हैं,जैसे कि चीन जाकर वहाँ रोबोट चलाने के लिए रात भर टीम के साथ काम करना और फिर "बेस्ट टीम को-ऑपरेशन" का पुरस्कार मिलना मेरे लिए अविस्मरणीय रहेगा। मैंने लगन के साथ मेहनत की और हमेशा नयी चीजों को यह सोचकर सीखा कि कभी ना कभी वह आगे ज़िन्दगी में काम आने वाली है। मैं अपने अनुभव के आधार पर सभी जूनियर्स को एक सन्देश देना चाहूँगा कि मेहनत एक "वेक्टर" की तरह है जिसमे मात्रा के साथ अगर सही दिशा हो तो मंजिल हमेशा मिलती है।